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कुदरगढ़ की पवित्र गाथा: जहां देवी दुर्गा ने किया था राक्षस कुदुर का वध, आज भी गूंजती है भक्ति की घंटियां

सूरजपुर, 12 अक्टूबर।
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले की घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित कुदरगढ़ माता मंदिर आस्था, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम है। मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां देवी दुर्गा ने असुर कुदुर का अंत किया था, और तभी से यह पर्वतीय क्षेत्र भक्तों के लिए शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र बन गया।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में “कुदुर” नामक राक्षस इस क्षेत्र में आतंक फैलाता था। देवी दुर्गा ने इसी स्थल पर उसका वध किया और उसी के नाम पर इस स्थान को “कुदरगढ़” कहा जाने लगा — अर्थात वह दुर्ग जहां कुदुर का अंत हुआ। राक्षस का संहार करने के बाद देवी यहीं विराजमान हो गईं, और तब से यह स्थान “मां कुदरगढ़” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

समुद्र तल से लगभग 800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मां कुदरगढ़ मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 1000 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है। भक्तों का विश्वास है कि जो व्यक्ति सच्चे मन और भक्ति के साथ यह यात्रा पूरी करता है, उसकी हर मनोकामना देवी मां पूरी करती हैं। नवरात्र के दौरान यहां विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें सूरजपुर, अंबिकापुर, बलरामपुर, झारखंड और उत्तर प्रदेश से हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन करने आते हैं।

कुदरगढ़, सूरजपुर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर और अंबिकापुर से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अंबिकापुर से सूरजपुर तक पक्की सड़क और वहां से निजी वाहन या टैक्सी के जरिए मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। यात्रा के दौरान हरियाली से भरी पहाड़ियां और घने साल के जंगल एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

कुदरगढ़ की पहाड़ियां प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हैं। यहां से दिखाई देने वाला सूर्योदय और सूर्यास्त मन को शांति से भर देता है। मंदिर परिसर में बजती घंटियों और पास बहते झरनों की ध्वनि एक आध्यात्मिक वातावरण रचती है।

सूरजपुर के वरिष्ठ नागरिक गोविंद प्रसाद गुप्ता बताते हैं, “मां कुदरगढ़ हमारी कुलदेवी हैं। जो भी यहां पहली बार आता है, उसकी मुराद पूरी होती है। अगर पर्यटन की सुविधाएं और बढ़ाई जाएं, तो यह छत्तीसगढ़ का प्रमुख धार्मिक स्थल बन सकता है।”

कुदरगढ़ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि यह आस्था और प्रकृति के मिलन की भूमि है। यहां हर पत्थर, हर हवा और हर घंटी देवी शक्ति की उपस्थिति का एहसास कराती है। जो एक बार कुदरगढ़ पहुंचता है, वह न केवल मां के दर्शन करता है बल्कि अपने भीतर की शांति और ऊर्जा को भी पुनः खोज लेता है।

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