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बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी का कट्टरपंथी एजेंडा: उदारवादी मुखौटे के पीछे छिपा सत्य

ढाका, 01 फरवरी (प्रेस ब्यूरो)। बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी की तथाकथित “मध्यमार्गी” छवि और उसकी वैचारिक जड़ों के बीच गहरा विरोधाभास स्पष्ट हुआ है। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, जमात का मूल सिद्धांत जनता की संप्रभुता नहीं, बल्कि ईश्वर की सर्वोच्चता पर आधारित है, और उसका अंतिम लक्ष्य ‘इकामत-ए-दीन’ यानी इस्लाम को जीवन की पूर्ण व्यवस्था के रूप में स्थापित करना है।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि जमात ने “दोहरी भाषा” की राजनीति में महारत हासिल कर ली है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर, पार्टी के वरिष्ठ नेता संवैधानिक मूल्यों की बात करते हैं और तुरंत शरीयत लागू न करने का वादा करते हैं, जिससे वे खुद को एक उदार और लोकतांत्रिक संगठन के रूप में प्रस्तुत कर सकें। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति पूरी तरह भिन्न है।

ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां चुनावी समर्थन का निर्धारण होता है, जमात का संदेश नागरिक जिम्मेदारी की तुलना में अधिक धार्मिक आदेश जैसा होता है। यहां वोट देना एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि आस्था की कसौटी के रूप में देखा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के कई नेता चुनाव चिह्न ‘दारिपल्ला’ को वोट देने को धार्मिक कर्तव्य और आध्यात्मिक पुरस्कार से जोड़कर प्रचारित करते हैं।

अध्ययन में यह भी दर्शाया गया है कि जमात की विचारधारा बांग्लादेश के संवैधानिक मूल्यों—समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव—से मेल नहीं खाती। इसका सबसे स्पष्ट असर महिलाओं को लेकर पार्टी की सोच में दिखाई देता है। पार्टी नेतृत्व ने ऐसे सामाजिक प्रस्तावों की चर्चा की है, जिनमें महिलाओं की कार्य-भागीदारी सीमित करने, उनके आवागमन को नियंत्रित करने और घरेलू भूमिकाओं को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह दृष्टिकोण बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरा उत्पन्न कर सकता है, क्योंकि महिलाएं औपचारिक कार्यबल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और गारमेंट उद्योग की रीढ़ मानी जाती हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जमात के नीति-निर्धारण निकायों में महिलाओं का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, जो सार्वजनिक जीवन से महिलाओं को हाशिये पर डालने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।

रिपोर्ट के निष्कर्ष में चेतावनी दी गई है कि यदि जमात नैतिकता पर एकाधिकार स्थापित करने में सफल होती है, तो कानूनी जवाबदेही की जगह वैचारिक कठोरता ले लेगी, जिसका सबसे बड़ा नुकसान बांग्लादेश की बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा।

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