
मंदसौर, 01 फरवरी (प्रेस ब्यूरो)। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के सीतामऊ स्थित नटनागर शोध संस्थान में आयोजित द्वितीय सीतामऊ साहित्य महोत्सव का शनिवार को गरिमामय समापन हुआ। इस तीन दिवसीय साहित्यिक आयोजन में देशभर से पधारे साहित्यकारों, विचारकों, इतिहासकारों, कलाकारों एवं पर्यावरणविदों ने अपने विचारों से श्रोताओं को समृद्ध किया। महोत्सव एक “नॉलेज कुंभ” के रूप में विकसित हुआ, जिसका सभी उपस्थितजनों ने लाभ उठाया।
ज्ञान चतुर्वेदी ने अंतिम दिन “किस्से कहानियां” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि कविता वही बनती है, जिसे लेखक ने स्वयं महसूस किया हो। लेखन में संवेदना का होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने जीवन को भीतर उतरकर समझने का महत्व बताया।
रज़ा काज़मी ने “पर्यावरण संरक्षण” विषय पर अपने विचार साझा करते हुए बताया कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। उन्होंने बच्चों को प्राकृतिक सौंदर्य से अवगत कराने और उनका संरक्षण करने का आह्वान किया।
जेरी पिंटो ने “किताबों की दुनिया” विषय पर कहा कि अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी पढ़ना भी जरूरी है, जिससे हमारी पहचान मजबूत होती है। उन्होंने शिक्षा और मानसिक संतुलन पर भी विचार किए।
मुजतबा खान ने “दादी-नानी के किस्से” बुनते हुए बताया कि यह आयोजन सीतामऊ को एक जश्न-ए-सीतामऊ में बदल देता है।
प्रशांत पांडे ने अपने प्रेरक अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने सुवासरा से फिल्मफेयर पुरस्कारों तक का सफर तय किया।
समापन अवसर पर हरदीप सिंह डंग ने कहा कि प्रशासन के प्रयासों से यह दूसरा साहित्य महोत्सव सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कलेक्टर अदिती गर्ग ने इस महोत्सव को एक अभिनव कदम बताते हुए कहा कि इसकी जड़ें मजबूत हो चुकी हैं, जो अब आगे चलकर एक वृहद वृक्ष का रूप लेंगी।
