
वाराणसी, 17 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। औषधीय गुणों से भरपूर विलायती तुलसी (मेसोस्फेरम सुवेओलेंस) पर एक विनाशकारी फंगल बीमारी का खतरा सामने आया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वनस्पति विज्ञान के वैज्ञानिकों के शोध में इस पौधे में एक घातक फंगस के संक्रमण की पुष्टि हुई है। यह भारत में विलायती तुलसी पर इस फंगस के संक्रमण का पहला दर्ज मामला माना जा रहा है।
बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग स्थित उन्नत अध्ययन केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार, विलायती तुलसी की पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे और शॉट-होल जैसे लक्षण पाए गए। विस्तृत मॉर्फोलॉजिकल, पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर विश्लेषण के बाद इसके लिए ‘कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला’ फंगस को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस शोध दल में डॉ. राघवेंद्र सिंह, शोधार्थी अभिनव, अजय कुमार नायक और सौम्यदीप रजवार के साथ-साथ केरल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शंभू कुमार एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय की शोधार्थी गार्गी सिंह शामिल हैं।
डॉ. राघवेंद्र सिंह ने बताया कि कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला को दुनिया के सबसे विनाशकारी पौध रोगजनकों में गिना जाता है। यह फंगस उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाया जाता है। यह फंगस 530 से अधिक पौध प्रजातियों को संक्रमित करता है और ‘कैसिकोलिन’ जैसे विषाक्त तत्वों के माध्यम से गंभीर पर्ण रोग उत्पन्न करता है।
संक्रमण के कारण विलायती तुलसी की पत्तियां समय से पहले गिरने लगीं और पौधे कमजोर होने लगे। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पौधा अब इस फंगस के लिए एक वैकल्पिक होस्ट के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे खाद्य फसलों में संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। अनुकूल परिस्थितियों में, यह फंगस फसलों की पैदावार को मुश्किल से नुकसान पहुंचा सकता है।
उल्लेखनीय है कि विलायती तुलसी एक सुगंधित औषधीय जड़ी-बूटी है, जो अपने समृद्ध सेकंडरी मेटाबोलाइट्स के लिए जानी जाती है। इसका उपयोग अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सर्दी-खांसी, घावों के उपचार और मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के लार्वा को नष्ट करने में भी किया जाता है। शोधकर्ताओं ने इस उभरते खतरे की नियमित निगरानी और समय रहते प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि यदि यह बीमारी व्यापक रूप से फैलती है, तो यह न केवल औषधीय पौधों बल्कि संपूर्ण पौध विविधता के लिए भी गंभीर संकट बन सकती है।
यह महत्वपूर्ण शोध जनवरी माह में अमेरिका से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित एल्सेवियर जर्नल ‘फिजियोलॉजिकल एंड मॉलिक्यूलर प्लांट पैथोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है। यह अध्ययन बीएचयू के नेतृत्व में गोरखपुर विश्वविद्यालय और केरल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया गया है।
