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तिल, गुड़ और लाई की खुशबू के संग मकर संक्रांति का स्वागत

पटना । सर्दियों की ठंडी हवा के बीच जब गलियों में तिलकुट की मीठी खुशबू फैलने लगती है, गुड़ की मिठास वातावरण में घुल जाती है और लाई–मुरही की खनक दुकानों पर सुनाई देने लगती है, तब यह संकेत होता है कि मकर संक्रांति अब दूर नहीं। शहर से लेकर गांव तक धीरे-धीरे पर्व का रंग चढ़ने लगता है। घरों में साफ-सफाई, बाजारों में चहल-पहल और रसोईघरों में पारंपरिक व्यंजनों की तैयारी इस पर्व के आगमन की घोषणा करती है।

मौसम के बदलाव के साथ नई ऊर्जा का पर्व

मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वह जीवंत परंपरा है, जो मौसम के बदलाव के साथ जीवन में नई ऊर्जा और उमंग भर देती है। यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है, जब दिन लंबे होने लगते हैं और शीत ऋतु की कठोरता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इस बदलाव का स्वागत देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न रूपों में होता है, लेकिन उत्तर भारत विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में तिल, गुड़ और लाई का विशेष महत्व है।

बाजारों में लौटी रौनक

जैसे-जैसे मकर संक्रांति नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे बिहार के बाजारों की रौनक बढ़ती जा रही है। शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर तिलकुट और गुड़ की दुकानों की कतारें सज गई हैं। पारंपरिक कारीगर दिन-रात मेहनत कर ताजे तिलकुट तैयार कर रहे हैं। कहीं गोल तिलकुट लोगों को लुभा रहा है, तो कहीं गजक और तिल की चिक्की की खुशबू ग्राहकों को अपनी ओर खींच रही है। दुकानदारों का कहना है कि इस वर्ष भी तिल और गुड़ से बनी मिठाइयों की मांग अच्छी बनी हुई है, क्योंकि लोग आज भी पारंपरिक स्वाद से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।

लाई और मुरही की दुकानों पर बच्चों की भीड़ देखते ही बनती है। रंग-बिरंगे पैकेटों में सजी लाई त्योहार की मिठास को और बढ़ा देती है। ग्रामीण इलाकों में आज भी घर-घर में लाई बनाने की परंपरा कायम है, जहां महिलाएं सामूहिक रूप से लाई तैयार करती हैं।

घरों में शुरू हुई त्योहार की तैयारी

मकर संक्रांति के आगमन के साथ ही घरों का माहौल भी उत्सवमय हो जाता है। रसोईघरों में तिलकुट, तिल-गुड़ के लड्डू, दही-चूड़ा और अन्य पारंपरिक व्यंजनों की तैयारी शुरू हो जाती है। परिवार के सभी सदस्य इस प्रक्रिया में शामिल होकर पर्व की खुशियों को दोगुना कर देते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

मकर संक्रांति का सामाजिक महत्व भी कम नहीं है। यह पर्व आपसी मेल-मिलाप और रिश्तों में मिठास घोलने का अवसर प्रदान करता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर तिलकुट और गुड़ भेंट करते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और बच्चों को मिठाइयां देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस अवसर पर सामूहिक भोज, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जहां लोकगीतों और लोकनृत्य की धूम रहती है।

बदलते दौर में भी जीवंत परंपरा

हालांकि, समय के साथ जीवनशैली में बदलाव आया है, लेकिन मकर संक्रांति की परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं। आधुनिक मिठाइयों और फास्ट फूड के दौर में भी तिल, गुड़ और लाई का स्वाद लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। युवा पीढ़ी भी इन पारंपरिक पकवानों के महत्व को समझने लगी है। सोशल मीडिया पर घर में बने तिलकुट और लाई की तस्वीरें साझा कर इस पर्व को नई पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय बनाया जा रहा है।

कारीगरों की मेहनत और उम्मीदें

मकर संक्रांति कारीगरों के लिए खास समय होता है। तिलकुट बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि वे महीनों पहले से इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं। अच्छे तिल और शुद्ध गुड़ का चयन कर पारंपरिक तरीकों से तिलकुट तैयार किया जाता है। उनके लिए यह सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला है। त्योहार के दिनों में जब दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ती है, तो उनकी मेहनत सफल होती नजर आती है। लाई बनाने वाले कारीगर भी इस मौसम का पूरे साल इंतजार करते हैं, क्योंकि यही समय उनकी कला और आजीविका दोनों को नई पहचान देता है। (हि.स.)

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