Saturday, March 7खबर जो असर करे |
Shadow

वैश्विक मंच पर हिंदी

शहर, 09 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)।
लेखक: LN Star News

भारत की सांस्कृतिक चेतना की समृद्ध विरासत हिंदी न केवल हमारी अस्मिता की पहचान है वरन हमारे राष्ट्र की आत्मा भी है। अब हिंदी केवल परस्पर संवाद और संपर्क का माध्यम ही नहीं है वरन वैश्विक स्तर पर भी अपनी सर्जनात्मकता, जिजीविषा और समावेशिता के कारण अपने प्रभुत्व का निरंतर विस्तार कर रही है। विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी) पर विशेष

इसलिए विश्व में हिंदी प्रयोक्ताओं की संख्या लगभग 100 करोड़ से अधिक हो गई है। पहले अंग्रेजों के साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होने का मिथक था जो इतिहास बन गया किंतु अब हिंदी के लिए गर्व का विषय है कि उसके बोलने, समझने और लिखने वालों का संसार इतना विराट हो गया कि वहाँ कभी सूर्य अस्त नहीं होता।
भारतीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद की प्रखरता को मुखरता के साथ प्रस्फुटित करने वाली हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने, हिंदी के प्रति प्रवासी भारतीयों में भावनात्मक रिश्ता कायम करने और विश्व में सकारात्मक वातावरण निर्मित करने के उद्देश्य से 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन संपन्न हुआ। फिर से विश्व हिंदी दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई है। अब तक विश्व के विभिन्न देशों में 12 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। फलस्वरूप हिंदी न केवल राष्ट्रीय आत्माभिमान का प्रतीक बनी है वरन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सांस्कृतिक संवाद, बौद्धिक विमर्श और भारतीय ज्ञान परंपरा का सशक्त माध्यम भी बनी है।
वैश्विक स्तर पर हिंदी की उपादेयता उसकी सरलता, सहजता, तकनीकी सटीकता, संवादों की आत्मीयता और समावेशी प्रकृति के कारण निरंतर बढ़ रही है। 90 के दशक में भारत में जब उदारीकरण, वैश्विकरण और औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई तब विश्व की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में आईं। अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका सहित यूरोप के अन्य देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी सिखाने का व्यवसाय कर रही हैं।
भारतीय जनमानस में सहिष्णुता, समरसता और स्व का भाव उत्पन्न करने वाली हिंदी वैश्विक फलक पर अपनी महत्ता का परचम लहरा रही है। हिंदी न केवल संख्या बल वरन भू विस्तार की दृष्टि से भी विश्व की प्रधान भाषाओं में से एक है। गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 50% से अधिक इंटरनेट उपभोक्ता हिंदी में सामग्री का उपभोग कर रहे हैं।
हमें फादर कामिल बुल्के के इन विचारों को नहीं भूलना चाहिए जो उन्होंने द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर मॉरीशस में अभिव्यक्त किए थे “द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि मॉरीशस के हिंदी भाषी नागरिकों से भारत के नागरिक प्रेरणा लेंगे”
आजादी के अमृत काल में पंच प्रण के बिंदु विकसित भारत, गुलामी की हर सोच से मुक्ति, विरासत पर गर्व, एकता और एकजुटता, नागरिकों द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन ऐसे महत्वपूर्ण आयाम हैं जिनके प्रति हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए।
हालांकि हिंदी की वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा बढ़ने के बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित है। हिंदी के साथ अंग्रेजी की प्रतिष्ठा बनाए रखने के कारण हिंदी अपने ही घर में दासी की स्थिति में रह रही है।
अतः हम सबको अपनी भाषा की ओर लौटने, उसे महत्व देने और दुनिया के लिए उसकी उपादेयता सिद्ध करने की की सख्त जरूरत है। अगर हम ऐसा कर सके तो 21वीं सदी हमारी होगी, हिंदी की होगी।
सृजन का उत्स है संधान भी है, तरक्की का यही उन्वान भी है ।
ज़ुबां कहते हैं हिंदी आप जिसको, फकत भाषा नहीं पहचान भी है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *