नई दिल्ली, 12 अक्टूबर। भारत में खेती के क्षेत्र में अब महिलाएं नवाचार और परिवर्तन की नई कहानी लिख रही हैं। वे केवल खेतों की मेहनतकश नहीं रहीं, बल्कि अब वे कृषि नवाचार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की बागडोर संभाल रही हैं। आज की महिला किसान खेती को परंपरा, विज्ञान और संवेदना के संगम से आगे बढ़ा रही हैं।
भारत की कृषि व्यवस्था में लंबे समय से पुरुषों का प्रभुत्व रहा है, लेकिन अब महिलाएं उस बदलाव की अग्रदूत बन रही हैं, जिसे ‘साइलेंट इनोवेशन’ कहा जा सकता है। वे मिट्टी की नमी से लेकर बीजों की गुणवत्ता तक, हर पहलू को अपनी समझ से दिशा दे रही हैं।

महिलाओं के इस नेतृत्व की सबसे बड़ी मिसाल प्राकृतिक खेती है — एक ऐसा आंदोलन जो अब पूरे देश में फैल रहा है। देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, जीवामृत और बीजामृत से चलने वाली यह खेती न केवल मिट्टी को फिर से उपजाऊ बना रही है बल्कि किसानों को रासायनिक उर्वरकों और महंगे इनपुट्स से भी मुक्ति दिला रही है।
आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में महिला समूहों ने प्राकृतिक खेती को नई पहचान दी है। वहीं मध्य प्रदेश में आदिवासी महिलाएं जैविक उत्पादों को ब्रांड बनाकर अमेज़न, फ्लिपकार्ट और सरकारी ई-मार्केट (GeM) जैसे प्लेटफॉर्म पर बेच रही हैं। इससे वे किसान से आगे बढ़कर ग्रामीण उद्यमी बन चुकी हैं।
महिलाएं खेती को केवल आर्थिक गतिविधि नहीं मानतीं, बल्कि इसे भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव के रूप में देखती हैं। वे मिट्टी को “मां” का रूप मानकर उसका सम्मान करती हैं और जानती हैं कि मिट्टी में ज़हर डालना अपने घर को नुकसान पहुंचाने जैसा है।
उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों की महिलाएं पारंपरिक खेती के तरीकों को जीवित रखे हुए हैं। भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद वे सीढ़ीदार खेती, जल प्रबंधन और मिट्टी संरक्षण की पुरानी तकनीकों को फिर से अपना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन परंपराओं को पुनर्जीवित करना जलवायु संकट से निपटने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार प्राकृतिक खेती और श्रीअन्न (मोटे अनाज) को बढ़ावा देने की बात कर चुके हैं। नीति आयोग और कृषि मंत्रालय द्वारा शुरू की गई योजनाओं का असली प्रभाव तब दिखाई देगा जब उन्हें महिला नेतृत्व और जमीनी अनुभवों से जोड़ा जाएगा।
वर्तमान में ग्रामीण महिलाओं का खेती में योगदान लगभग 60 प्रतिशत है, लेकिन नीति निर्माण में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि उन्हें केवल “लाभार्थी” नहीं बल्कि निर्णयकर्ता और नीति-निर्माता के रूप में देखा जाए।
भारत की कृषि को आत्मनिर्भर और सतत बनाने के लिए केवल तकनीक या रसायन नहीं, बल्कि संवेदना, परंपरा और महिला शक्ति की जरूरत है। महिलाएं आज न सिर्फ खेती बचा रही हैं बल्कि उसे भविष्य के लिए और सशक्त बना रही हैं।
जैसा कि लेखिका सुषमा सिंह कहती हैं — “जहां स्त्री है, वहां सृजन है।” जब महिलाओं को कृषि के केंद्र में रखा जाएगा, तभी भारत की धरती फिर से हरी-भरी, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन पाएगी।
