नई दिल्ली। देश की राजधानी आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit:) के ऐतिहासिक मंच से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (International Diplomacy) का एक नया आयाम देखने को मिला। भारत (India) की मेजबानी में जारी हुए नई दिल्ली घोषणापत्र (New Delhi Declaration) में ईरान के प्रति गहरा विश्वास झलका। पश्चिमी एशिया के घटनाक्रमों पर इस्राइल को खुलकर नसीहत दी गई। अमेरिका का सीधा नाम लिए बिना उसकी एकतरफा पाबंदियों और आर्थिक नीतियों पर तीखा निशाना साधा गया है। यह साझा घोषणापत्र सामने आते ही भारत के बढ़ते दबदबे का दुनिया को एहसास हो गया। क्यों कि इससे ये बात साफ हो गई कि भारत अब पश्चिमी देशों के प्रभाव से निकलकर पूरी मजबूती के साथ ग्लोबल साउथ यानी वैश्विक दक्षिण की अगुवाई करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
भारत की विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत क्या?
ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र में अपनाई गई भाषा बेहद नपी-तुली और कूटनीतिक संतुलन से भरी हुई रही। इस दस्तावेज को तैयार करना भारत के लिए सबसे बड़ी परीक्षा थी, क्योंकि इसमें शामिल ग्यारह देशों के अपने-अपने अलग हित और तनाव थे। भारत ने इस साझा बयान में उन सभी मुद्दों को जगह दी है जो विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ के भविष्य से जुड़े हैं। हालांकि इस घोषणापत्र के कुछ कड़े शब्दों को देखकर यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या भारत का झुकाव अब पश्चिम से हट रहा, लेकिन हकीकत यह है कि भारत ने किसी एक गुट का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र और बहुपक्षीय नीति को ही सर्वोपरि रखा।
ईरान के साथ रिश्तों में भरोसे की नई तस्वीर कैसे बनी?
ईरान हमेशा से भारत को अपना एक अत्यंत महत्वपूर्ण, भरोसेमंद और ऐतिहासिक साझेदार मानता रहा है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के भारत आगमन से पहले ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा था कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सदियों पुराने और सभ्यतागत हैं। ईरान भारत के साथ अपने संबंधों को बहुत ऊंचा दर्जा देता है। व्यापार, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और चाबहार बंदरगाह को लेकर ईरान का सकारात्मक रुख इसी गहरे भरोसे का परिणाम है। नई दिल्ली में भी दोनों देशों के इस विश्वास की मजबूत झलक देखने को मिली।
ब्रिक्स बिजनेस फोरम के दौरान भारत मंडपम से एक बेहद ताकतवर और चर्चित तस्वीर सामने आई। इस तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का हाथ थामकर आयोजन स्थल की ओर ले जाते हुए दिखाई दिए। उनके साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी चल रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी और पेजेशकियान के चेहरों पर सहजता और गर्मजोशी साफ देखी जा सकती थी। यह केवल दो नेताओं के साथ टहलने की सामान्य तस्वीर नहीं थी, बल्कि इसने पूरी दुनिया को यह स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया कि पश्चिम एशिया के भारी तनाव के बावजूद भारत और ईरान के रिश्ते बेहद आत्मीय और मजबूत हैं।
भारत ने ईरान को कैसे अलग-थलग होने से बचाया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ द्विपक्षीय बातचीत में स्पष्ट कर दिया कि भारत-ईरान दोस्ती दीर्घकालिक है और इसे दोनों देशों के साझा लाभ की रणनीति के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। पश्चिम एशिया में चल रहे भीषण युद्ध और प्रतिबंधों के दौर में भी भारत ने ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद को टूटने नहीं दिया। भारत ने निरंतर यह बात दोहराई कि क्षेत्र में स्थायी शांति केवल बातचीत और कूटनीति के रास्ते से ही संभव है। इससे यह साफ हो गया कि भारत ईरान को अलग-थलग करने के किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है, बल्कि उसके साथ निरंतर संपर्क और साझेदारी कायम रखेगा।
ब्रिक्स के घोषणापत्र में इस्राइल को लेकर क्या कहा गया?
संयुक्त घोषणापत्र में इस्राइल का कई जगह नाम आया। गाजा में जारी हिंसा को लेकर चिंता जताई गई और फलस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया गया। घोषणापत्र में 1967 की सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु फलस्तीनी राष्ट्र के गठन का समर्थन किया गया, जिसकी राजधानी पूर्वी यरूशलम हो। गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाने को लेकर इस्राइल की कानूनी जिम्मेदारी का भी उल्लेख किया गया। यानी ब्रिक्स के दस्तावेज में इस्राइल के संबंध में भाषा सीधे और स्पष्ट रूप से सामने आई।
लेबनान को लेकर इस्राइल से क्या कहा गया?
ब्रिक्स घोषणापत्र में लेबनान को लेकर भी इस्राइल का सीधे नाम लिया गया। दस्तावेज में लेबनान में युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से उसकी शर्तों का पालन करने को कहा गया। साथ ही इस्राइल से लेबनानी सरकार के साथ हुए समझौते का सम्मान करने और लेबनान के उन सभी क्षेत्रों से अपनी सेना हटाने का आह्वान किया गया, जहां वह मौजूद है। इस तरह ब्रिक्स के घोषणापत्र में इस्राइल को लेकर केवल सामान्य अपील नहीं की गई, बल्कि कुछ मुद्दों पर सीधे मांग भी रखी गई।
बिना नाम लिए अमेरिका पर कैसे साधा निशाना?
ब्रिक्स घोषणापत्र में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया, लेकिन एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना की गई। घोषणापत्र में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा दबाव वाले कदमों और आर्थिक प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक प्रभाव होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे प्रतिबंधों का सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है। अमेरिका का नाम नहीं होने के बावजूद इस भाषा का संदर्भ महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूस और ईरान दोनों लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। इसलिए घोषणापत्र की भाषा अमेरिका की नीतियों पर परोक्ष निशाने के तौर पर देखी जा सकती है।
क्या अमेरिकी शुल्क नीति की भी आलोचना हुई?
ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं होने वाले एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों पर भी गंभीर चिंता जताई। घोषणापत्र में किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन ऐसी भाषा को अमेरिका की शुल्क नीति के संदर्भ में देखा जा सकता है। ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद ब्रिक्स देशों पर अमेरिकी शुल्क और आर्थिक दबाव का मुद्दा भी चर्चा में रहा है। भारत ने भी अमेरिका की ओर से रूसी तेल की खरीद को लेकर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को अनुचित, अन्यायपूर्ण और अनुचित बताया था तथा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की बात कही थी।
