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शेखपुर गांव की अनोखी होली…


-सैकड़ों वर्षों से सांस्कृतिक व स्वास्थ्यवर्धक प्रेरणा देने मनाई जा रही होली
दुश्मनी भुलाकर घर-घर दस्तक देकर एक दूसरे को गले लगाकर भुला देते गिले-शिकवे
मुरैना। होली का त्यौहार पर कुछ लोग पूरानी दुश्मनी भुला लेते है। लेकिन मुरैना के शेखपुर गांव मे अनोखी होली का त्यौहार मनाया जाता है। ऐसा भी नहीं कि यह होली इसी वर्ष से मन रही है, सैकड़ों सालों से गांव के लोग अपनी इस परंपरा को कायम रखे हुए है। गांव में सामाजिक सदभाव, भाई चारा  बना रहे  इसलिए होली के दिन ग्राम शेखपुर में सैकड़ों वर्षों से सांस्कृतिक व  स्वास्थ्यवर्धक प्रेरणा देने और एकजुट की भावना को बनाये रखने पुरानी परपंरा को आज भी जीवंत रखा जा रहा है । होलिका दहन से लेकर धूलंडी  के दूसरे दिवस तक चार बार गांव के घर-घर पर महिला पुरुषों द्वारा दस्तक दिए जाने से वर्ष भर के आपसी मनभेद भी मिटा दिए जाते हैं। इस सामूहिक मेल मिलाप से सामाजिक सोहाद्र बरकरार रखने का कार्य किया जा रहा है । गांव के बुजुर्ग पुरुष एवं महिला इसे स्थानीय संत महाराज विजयानंद की धार्मिक मान्यता व प्रथा को पूर्ण करना बताते हैं। शारीरिक सौष्ठव का संदेश नई पीढ़ी को देने के लिए गांव में आयोजित नाल उठाने की प्रतियोगिता में मध्यप्रदेश राजस्थान व उत्तरप्रदेश के पहलवान भी शामिल होते हैं। वहीं धुलेंडी की दोपहर में प्रभात फेरी के लिए सजधज कर निकली महिलाएं इसे सुख शांति वैभव का संदेश देना भी बताती है। गांव में एक दूसरे के सुख दु:ख में साथ रहने का वचन ग्रामीणों ने इस बार भी निर्वहन किया। इसी कारण दो दिवस पूर्व ग्रामीण युवा की हुई मृत्यु के कारण सभी आयोजन की औपचारिकताएं पूरी की गई।
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नाल उठाने की प्रतियोगिता मेें कई राज्यों के खिलाड़ी होते हैं शामिल
 गांव की नई पीढ़ी को स्वस्थ रखने के लिए एक बृहद संदेश देने का काम इस उत्सव में किया जा रहा है। गांव में संत विजयानंद मंदिर परिसर में नाल उठाने की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है, जिसमें अंचल के साथ-साथ उत्तर प्रदेश व राजस्थान के भी पहलवान शामिल होकर नाल उठाकर गौरवान्वित होते हैं। इन पहलवानों का उत्साहवर्धन करने के लिए गांववासी एवं अंचल से आए दर्शक नगद राशि का पुरस्कार प्रदान करते हैं। इस वर्ष 51 रुपए से लेकर 5100 तक के पुरस्कार नाल उठाने वाले पहलवानों को प्रदान किए जाते हैं।
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सुबह प्रभातफेरी शाम को महिलाएं जाती है एक दूसरे के घर
जिला मुरैना की कैलारस तहसील के शेखपुर गांव में 500 वर्षों से होली का पर्व अनोखी परपंरा के साथ मनाया जाता है । होलिका दहन के पश्चात ही पुरुष व महिलाएं गांव के एक-एक घर में फेरी लगाकर एक दूसरे को गुलाल लगाकर रंगों के त्योहार होली की हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं। धुलेंडी के दिन सुबह गांव के पुरूष प्रभातफेरी निकालकर घर-घर में मेलमिलाप करते हैं । वहीं शाम को गांव की एक एक महिला सुसज्जित होकर घर घर जाती है । महिलाएं इसे एकजुटता तथा सुख शांति समृद्धि का संदेश देना मानती है। इस दौरान जिस घर में नई शादी होकर बहू आती है उस बहू द्वारा किये गये नृत्य में अन्य नवेली बहु भी शामिल होती है। यह उत्साह उमंग के साथ उन्हीं के दरवाजे पर होता है। धुलेंडी  के दूसरे दिवस भी महिलाएं एक बार फिर घर-घर जाकर एक दूसरे से मिलती हैं ।यह भी प्रभात फेरी के रूप में ही होता है। इससे वर्ष भर का अवसाद तो मिटता ही है,  वहीं सामाजिक सोहाद्र बढ जाता है।इस परपंरा को गांव के ही संत बाबा विजयानंद का आशीर्वाद मानकर गांव वासी करते आ रहें हैं ।
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ग्रामीणजन गीत की रचनाकर  देशी वाद्य व संगीत के साथ गायन करते हैं, खुशी का नहीं रहता ठिकाना
पुरूषों द्वारा होली के फाग का भी प्रतियोगिता जैसा गायन होता है। इसे सांस्कृतिक विरासत के तहत ग्रामीणजन सहेजना बताते हैं। इसमें रामायण, महाभारत एवं हमारे धार्मिक ग्रंथों के आधार पर ग्रामीणजन गीत की रचनाकर  देशी वाद्य व संगीत के साथ गायन करते हैं। इससे नई पीढ़ी धर्म एवं विरासत से परिपूर्ण होती है ऐसा ग्रामीण जन का मानना है। वहीं इस प्रथा को संत विजयानंद का आशीर्वाद मानते हुए समस्त गांववासी अपनी बहन बेटियों व मान्य धान्य को उत्साह के साथ आमंत्रित करते हैं। इस आमंत्रण पर सभी रिश्तेदार आते भी हैं। इससे नई पीढ़ी को अपने सभी रिश्तेदारों, परिजनों की जानकारी व भेंट करने का अवसर मिलता है। होली के इस रंग भरे त्यौहार को दीपावली से अधिक बड़े उत्सव में बदलना यहां की बरसों पुरानी परंपरा है। जिसका निर्वहन आज नई पीढ़ी भी करती आ रही है। इस प्रथा के विरुद्ध जाना संत विजयानंद का अपमान माना जाता हैं।

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