
प्रयागराज, 02 फरवरी (प्रेस ब्यूरो)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि आपसी सहमति से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखने के बाद यदि रिश्ता टूटता है, तो इससे उत्पन्न निराशा पर धोखे और छल से संबंध बनाने का आरोप लगाना दंडनीय अपराध नहीं होता।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 केवल उन संबंधों को दंडित करती है जो धोखे या छल से बने हों, न कि आपसी सहमति से बने रिश्तों के टूटने से होने वाली निराशा को। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक चले सहमति आधारित संबंध को बाद में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने झूठे वादे से संबंध बनाने की धारा 69 के तहत दर्ज अपराध को रद्द कर दिया, हालांकि अन्य धाराओं में दर्ज प्राथमिकी की विवेचना जारी रखने का आदेश दिया है। पुलिस रिपोर्ट पेश होने तक याचियों की गिरफ्तारी पर रोक भी लगाई गई है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की खंडपीठ ने नीलेश राम चंदानी की याचिका के संदर्भ में दिया है।
शिकायतकर्ता ने नोएडा सेक्टर 63 थाने में धारा 352, 351(2), 69 और दहेज निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था। याची के अधिवक्ता ने बताया कि जोधपुर में एलएलएम के दौरान दोनों के बीच नजदीकी आई और जून 2023 में सगाई भी हुई थी। नवम्बर 2024 में उनकी शादी तय थी, जिसके लिए होटल बुकिंग, कार्ड छपाई और फोटोग्राफर तक तय किए जा चुके थे। लड़की पिछड़े वर्ग से थी। यह जानकारी होने के बावजूद याची परिवार शादी के लिए राजी था। अचानक शादी टूटने पर लड़की ने एफआईआर दर्ज कराई और आरोप लगाया कि शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि शादी का वास्तविक इरादा मौजूद था, इसलिए यह धोखाधड़ी का मामला नहीं बनता। हालांकि धमकी और मारपीट से संबंधित आरोपों की जांच जारी रहेगी।
