
नई दिल्ली, 02 फरवरी (प्रेस ब्यूरो)। भारत और श्रीलंका के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंधों को और प्रगाढ़ करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। भारत सरकार ने भगवान बुद्ध के अत्यंत पवित्र ‘देवनीमोरी अवशेषों’ को प्रदर्शनी के लिए श्रीलंका भेजने का निर्णय लिया है, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को और अधिक सशक्त बनाना है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अप्रैल 2025 के श्रीलंका दौरे के विजन को आगे बढ़ाते हुए यह प्रदर्शनी कोलंबो के गंगारामया मंदिर में आयोजित की जाएगी। ये पवित्र अवशेष 4-10 फरवरी 2026 तक कोलंबो में सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए होंगे और 11 फरवरी 2026 को वापस लौटेंगे। इसका मुख्य उद्देश्य साझा बौद्ध विरासत को मजबूत करना और दक्षिण एशिया में शांति का संदेश देना है।
भारत का प्रतिनिधिमंडल गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में वहां जाएगा। अवशेषों को भारतीय वायु सेना के एक विशेष विमान से राजकीय सम्मान के साथ कोलंबो ले जाया जाएगा।
ये पवित्र अवशेष गुजरात के अरावली जिले में स्थित देवनीमोरी पुरातात्विक स्थल से 1957 की खुदाई में प्राप्त हुए थे और वर्तमान में ये बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में सुरक्षित हैं। अवशेषों को एक हरे रंग के शिला पत्थर की पेटी में रखा गया है, जिस पर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत में “दशबल शरीर निलय” लिखा है, जिसका अर्थ ‘बुद्ध के पार्थिव अवशेषों का विश्राम स्थल’ है।
अवशेषों की सुरक्षा के लिए इन्हें एक वायुरोधी कांच के पात्र में सोने की परत चढ़ी चांदी-तांबे की बोतल और रेशमी वस्त्र के साथ रखा गया है।
यह आयोजन भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और सांस्कृतिक कूटनीति का एक सशक्त उदाहरण है। इससे पहले भारत ने थाईलैंड, मंगोलिया, वियतनाम और रूस जैसे देशों में भी भगवान बुद्ध के अवशेषों को प्रदर्शित कर शांति और करुणा का वैश्विक संदेश दिया है।
उल्लेखनीय है कि श्रीलंका में होने वाली यह प्रदर्शनी हाल ही में भारत में पवित्र पिपरावा रत्न अवशेषों की प्रशंसित वापसी के बाद आयोजित की जा रही है, जिसे प्रधानमंत्री ने एक अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर की घर वापसी बताया है।
