धर्म ही है सृष्टि का संचालक और भारत के पुनरुत्थान का आधार
By: डॉ. मयंक चतुर्वेदी
डॉ. मोहन भागवत ने ‘धर्म’ को सृष्टि का संचालक बताया है। उनका कथन है, सृष्टि निर्माण के साथ उसके संचालन के लिए बने नियम ही धर्म हैं। ये नियम विश्वव्यापी हैं। कोई व्यक्ति या वस्तु पूर्णतः अधर्मी नहीं हो सकते। यह प्राचीन ग्रंथों की गहन व्याख्या पर आधारित उनका धर्म के विषय में निष्कर्ष है। श्रीमद्भागवत, मनुस्मृति, पाराशर स्मृति, महाभारत जैसे ग्रंथ ‘धर्म’ को स्वाभाविक नियम के रूप में परिभाषित करते हैं।
डॉ. भागवत जी का मूल सूत्र यही है कि ‘धर्म’ ही पूरी सृष्टि का ड्राइवर है। यही श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है “धर्मः सनातनः सर्वस्य मूलं” अर्थात् धर्म सनातन है और समस्त सृष्टि का मूल। भगवान विष्णु स्वरूप में सृष्टि संचालित करते हैं। नियम ‘धर्म’ के रूप में निर्धारित हैं। यहां डॉ. भागवत जल को बहने और अग्नि को जलाने का ‘धर्म’ बताते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा श्रीमद्भागवत पु...

