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हारे का सहारा, खांटू श्याम का दीवाना : अकेले पैदल निकला 1500 किलोमीटर की यात्रा पर

उमरिया, 13 अक्टूबर (हि.स.)। भक्ति जब सच्चे मन से की जाती है तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं। ऐसी ही एक अद्भुत कहानी है खांटू श्याम जी के एक अनोखे भक्त की, जिसने अपने ईष्ट देव को हृदय में बसाकर अकेले ही 1500 किलोमीटर की पदयात्रा पर निकलने का संकल्प लिया है। यह भक्त है छत्तीसगढ़ के शक्ति जिले के भद्रा पाली गांव का रहने वाला नितीश कुमार सिहार, उम्र मात्र 23 वर्ष। सोमवार को मप्र के उमरिया जिले से निकलते वक्‍त उनसे बातचीत में उन्‍होंने हिस से अपनी यात्रा के बारे में विस्‍तार से बताया है।

नितीश बताते हैं कि वे पढ़ाई के साथ-साथ भक्ति में भी रुचि रखते हैं। लगभग 15 दिन पहले उनके मन में विचार आया कि “श्याम बाबा के दर्शन करने क्यों न पैदल जाया जाए?” बस, उसी क्षण उन्होंने बिना किसी तैयारी के अपने घर से निकलना तय किया और हाथ में श्याम बाबा का झंडा लेकर अकेले ही डेढ़ हजार किलोमीटर की इस कठिन यात्रा पर निकल पड़े।

नितीश का गंतव्य है राजस्थान के सीकर जिले का प्रसिद्ध खांटू श्याम मंदिर, जहां पूरी दुनिया से भक्तजन अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। खांटू श्याम जी वही हैं जिन्हें ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है। कथा के अनुसार, वे महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे। महाभारत के समय जब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा कि वे युद्ध में किसका साथ देंगे, तो उन्होंने कहा, “जो हारेगा, मैं उसका साथ दूंगा।” यह सुनकर श्रीकृष्ण ने युद्ध के संतुलन के लिए उनसे उनका सिर मांगा और वरदान दिया कि वे कलियुग में “खांटू श्याम” के रूप में पूजे जाएंगे। तभी से बर्बरीक को “हारे का सहारा” और “खांटू श्याम जी” के नाम से पूजा जाता है।

नितीश का कहना है कि उनके मन में एक मन्नत है जिसे लेकर वे यह यात्रा कर रहे हैं। वे बताते हैं, “ट्रेन या बस से तो सभी जाते हैं, पर मैंने सोचा कि क्यों न पैदल चलकर बाबा के दर्शन किए जाएं। जो भी रास्ते में मिल जाता है, वही मेरा सहारा बन जाता है, कोई भोजन दे देता है तो खा लेता हूं, कोई ठहरने की जगह दे देता है तो वहीं विश्राम कर लेता हूं।”

इस यात्रा में नितीश ने अब तक लगभग 500 किलोमीटर की दूरी तय कर ली है, जबकि करीब 1000 किलोमीटर और बाकी है। रास्ते में गौ सेवा संस्थान जैसे सामाजिक संगठनों के लोग उन्हें भोजन और रुकने की जगह उपलब्ध करा रहे हैं। उनकी आंखों में सिर्फ एक ही सपना है, “कब अपने श्याम जी के दर्शन करूं।” न खाने की चिंता, न सोने की, बस एक ही धुन है अपने ईष्ट के दर्शन की। इस युवा भक्त की आस्था और समर्पण यह दर्शाती है कि सच्ची भक्ति में न थकान होती है, न दूरी का बोध।

दरअसल, नितीश की यह अनोखी यात्रा न सिर्फ श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह भी दिखाती है कि जब मन में अटूट विश्वास और ईश्वर के प्रति प्रेम हो, तो कोई भी मंजि‍ल कठिन नहीं होती। नितीश के शब्दों में “बस बाकी जाने श्याम जी…”

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