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बायर डायरेक्टएकर्स की डीएसआर तकनीक से बदली धान की खेती की तस्वीर

भारत में धान देश की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में शामिल है और अधिकांश क्षेत्रों में इसकी खेती अब भी पारंपरिक रोपाई पद्धति से की जाती है। इस पद्धति में पहले नर्सरी तैयार की जाती है, फिर पौधों की रोपाई की जाती है, जिससे सिंचाई, मजदूरी और समय—तीनों पर अधिक खर्च आता है। ऐसे समय में मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले का डोके गांव धान उत्पादन में एक नए बदलाव का उदाहरण बनकर उभरा है। यहां किसानों ने आधुनिक तकनीक अपनाकर खेती की लागत घटाने और उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है।

डोके गांव के अधिकांश किसान वर्षों से धान की खेती पर निर्भर रहे हैं। हालांकि लगातार बढ़ती मजदूरी, सिंचाई का खर्च और घटता मुनाफा उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया था। हर सीजन में खेती की लागत बढ़ रही थी, जबकि आय अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में किसानों को खेती के अधिक व्यवहारिक और किफायती विकल्प की तलाश थी।

वर्ष 2024 में गांव के कुछ किसानों का संपर्क बायर डायरेक्टएकर्स की फील्ड टीम से हुआ। टीम ने किसानों को डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक की जानकारी दी। यह तरीका अधिकांश किसानों के लिए बिल्कुल नया था, क्योंकि इसमें पारंपरिक रोपाई की आवश्यकता नहीं होती और बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं। शुरुआत में किसानों को यह प्रयोग जोखिमपूर्ण लगा, लेकिन पांच किसानों ने इस तकनीक पर भरोसा जताते हुए 16 एकड़ क्षेत्र में इसकी शुरुआत की।

इस पहल के तहत किसानों को एराइज बीज, खरपतवार प्रबंधन संबंधी मार्गदर्शन, बुआई के लिए सीड ड्रिल मशीनों की सुविधा तथा बायर डायरेक्टएकर्स के व्हाट्सएप चैटबॉट ‘आस्क दीना’ के माध्यम से खेती के प्रत्येक चरण में सलाह उपलब्ध कराई गई। तकनीकी सहयोग और वैज्ञानिक मार्गदर्शन का असर जल्द ही खेतों में दिखाई देने लगा।

डीएसआर तकनीक अपनाने से रोपाई की आवश्यकता समाप्त हो गई, जिससे मजदूरी पर होने वाला खर्च काफी कम हुआ। पानी का उपयोग भी अधिक दक्षता के साथ होने लगा और खेती की बारिश पर निर्भरता पहले की तुलना में घटी। फसल तैयार होने पर किसानों को स्वस्थ उत्पादन, कम लागत और बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ।

इस सफलता ने पूरे गांव का ध्यान आकर्षित किया। फसल कटाई के दौरान आयोजित फसल प्रदर्शन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसान डीएसआर तकनीक से तैयार खेतों को देखने पहुंचे। कम लागत, कम श्रम और बेहतर फसल के परिणामों ने उन्हें प्रभावित किया। जो तकनीक शुरुआत में संदेह का विषय थी, वही धीरे-धीरे किसानों के लिए भरोसेमंद विकल्प बन गई।

पहले वर्ष की सफलता के बाद अगले सीजन में 18 और किसानों ने डीएसआर तकनीक अपनाई, जिससे इसका क्षेत्रफल बढ़कर 58 एकड़ तक पहुंच गया। अब डोके गांव में यह तकनीक किसी प्रयोग के बजाय खेती की पुरानी समस्याओं का व्यवहारिक समाधान मानी जाने लगी है। मजदूरी और सिंचाई की बढ़ती लागत जैसी चिंताओं के स्थान पर किसान अब बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ की संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं।

पांच किसानों द्वारा शुरू किया गया यह प्रयास धीरे-धीरे पूरे गांव के लिए प्रेरणा बन गया। किसानों ने एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हुए आधुनिक तकनीक को अपनाया और सामूहिक रूप से खेती में बदलाव का रास्ता तैयार किया।

वर्तमान में डोके गांव के 45 अतिरिक्त किसान भी बायर डायरेक्टएकर्स के साथ डीएसआर तकनीक अपनाने की इच्छा जता चुके हैं। इसके साथ ही आने वाले समय में इस तकनीक का विस्तार और अधिक क्षेत्र में होने की संभावना है। इससे गांव पारंपरिक रोपाई आधारित खेती की अधिक लागत और अनिश्चित लाभ की स्थिति से निकलकर नवाचार आधारित, पर्यावरण-अनुकूल और अधिक लाभकारी कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

डीएसआर तकनीक का लाभ केवल लागत कम होने तक सीमित नहीं है। इससे किसानों को व्यस्त कृषि मौसम में मजदूरों की कमी की समस्या से भी राहत मिली है। पानी की बचत, मौसम की अनिश्चितता से बेहतर मुकाबला करने की क्षमता और आधुनिक कृषि तकनीकों पर बढ़ता विश्वास किसानों के लिए अतिरिक्त उपलब्धियां साबित हुई हैं।

डोके गांव की यह कहानी केवल नई कृषि तकनीक अपनाने की सफलता नहीं, बल्कि किसानों की बदलती सोच और सामूहिक प्रयासों की भी मिसाल है। यह उदाहरण बताता है कि उचित तकनीकी मार्गदर्शन, आपसी सहयोग और नवाचार को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और भविष्य के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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