डॉ. मयंक चतुर्वेदी

23 जुलाई 1955 को स्थापित भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) आज केवल देश का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन होने के नाते भारतीय श्रम दर्शन का सबसे सशक्त प्रतिनिधि है। वस्तुत: जब विश्व का श्रमिक आंदोलन पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच संघर्ष की धुरी पर घूम रहा था, तब राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करते हुए श्रम आंदोलन को एक तीसरा मार्ग दिया, जिसके लिए कहा गया, “राष्ट्रहित, उद्योगहित और मजदूरहित” का मार्ग। यही कारण है कि सात दशक बाद भी आज बीएमएस राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों की रचनात्मक भागीदारी का एक सशक्त मंच बनकर खड़ा है।
यहां ध्यान देने योग्य है कि भारतीय मजदूर संघ का जन्म ऐसे समय हुआ था, जब अधिकांश ट्रेड यूनियनें राजनीतिक दलों अथवा वैचारिक समूहों के प्रभाव में काम कर रही थीं। कहीं वर्ग संघर्ष की कम्युनिस्ट अवधारणा प्रमुख थी तो कहीं श्रमिक आंदोलन राजनीतिक दबाव का माध्यम बन गया था। बीएमएस ने इस सोच से अलग हटकर स्पष्ट किया कि उद्योग और श्रमिक एक-दूसरे के विरोधी न होकर परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं, वे सभी एक औद्योगिक परिवार के सदस्य हैं।
कहना होगा कि दत्तोपंत ठेंगड़ी ने “उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, श्रमिकों का उद्योगीकरण और राष्ट्र का श्रमिकीकरण” का जो सूत्र दिया, वह आज भी बीएमएस की कार्यदिशा है। संगठन का मानना रहा कि श्रमिक का सम्मान और उद्योग की प्रगति एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि उद्योग बढ़ेगा तो रोजगार बढ़ेगा और यदि श्रमिक सुरक्षित होगा तो उत्पादन तथा उत्पादकता दोनों बढ़ेंगे।
भारतीय संस्कृति से जुड़ा श्रम दर्शन
बीएमएस की सबसे बड़ी विशेषता उसका भारतीय सांस्कृतिक आधार है। संगठन श्रम को राष्ट्रसेवा का माध्यम मानता है। ऋग्वेद में वर्णित विश्वकर्मा की परंपरा, कर्मयोग और यज्ञ की भावना को आधुनिक औद्योगिक संबंधों से जोड़ते हुए संगठन यह संदेश देता है कि श्रमिक और उद्योगपति दोनों राष्ट्र निर्माण के साझेदार हैं। इसी कारण बीएमएस ने पश्चिमी “मालिक बनाम मजदूर” की अवधारणा के स्थान पर “औद्योगिक परिवार” की संकल्पना को आगे बढ़ाया। इसी कारण से आज यह दृष्टिकोण उसे अन्य ट्रेड यूनियनों से अलग पहचान देता है।
असंगठित श्रमिकों की आवाज बना भारतीय मजदूर संघ
भारत के लगभग 90 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं। लंबे समय तक यह विशाल वर्ग सामाजिक सुरक्षा से वंचित रहा। भारतीय मजदूर संघ उन पहले संगठनों में था जिसने इस वर्ग की समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया। संगठन के लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 अस्तित्व में आया। इसके बाद बीएमएस लगातार ऐसे राष्ट्रीय डेटाबेस की मांग करता रहा, जिससे प्रत्येक श्रमिक की पहचान सुनिश्चित हो सके।
इसी दिशा में आगे चलकर ई-श्रम पोर्टल अस्तित्व में आया, जिसके माध्यम से करोड़ों असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, दुर्घटना बीमा तथा अन्य सरकारी लाभों से जुड़े। तथ्यों के आधार पर आप हम सभी ये देख सकते हैं कि कैसे यह एक प्रशासनिक सुधार श्रमिकों को औपचारिक पहचान देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ।
श्रम सुधारों में रचनात्मक भूमिका
जब देश के 44 पुराने श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समाहित करने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब भारतीय मजदूर संघ ने न तो आंख मूंदकर समर्थन किया और न ही विरोध की राजनीति अपनाई, उसने श्रमिक हितों की रक्षा करते हुए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव केंद्र सरकार को दिए। जिसके परिणाम स्वरूप संगठन के आग्रह पर गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों को पहली बार कानूनी पहचान मिली। फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी संबंधी प्रावधानों में सुधार हुआ। अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों, नियुक्ति पत्र, राशन की पोर्टेबिलिटी और यात्रा सुविधाओं जैसे विषयों को भी श्रम सुधारों में स्थान मिला। बीएमएस का मानना रहा कि सुधार आवश्यक हैं, किंतु उनका उद्देश्य श्रमिक सुरक्षा को कमजोर करना नहीं होना चाहिए।
ईपीएफ, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए सतत अभियान
भारतीय मजदूर संघ ने कर्मचारियों के भविष्य निधि, न्यूनतम पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर लगातार राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाए। ईपीएफओ कार्यालयों के समक्ष आयोजित अभियानों ने कर्मचारियों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई। इसी क्रम में भविष्य निधि दावों के ऑटो-सेटलमेंट जैसी व्यवस्थाओं तथा पेंशन प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी सुधार देखने को मिले। बीएमएस का मानना है कि श्रमिक का सम्मान केवल नौकरी तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके वृद्धावस्था जीवन की सुरक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।
महिला श्रमिकों के अधिकारों की मुखर आवाज
औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए भारतीय मजदूर संघ ने सुरक्षित कार्यस्थल, समान वेतन और गरिमामय कार्य परिस्थितियों की मांग को लगातार उठाया। श्रम संहिताओं में महिलाओं की सुरक्षा, परिवहन, क्रेच सुविधा तथा आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ रात्रिकालीन कार्य संबंधी प्रावधानों को अधिक व्यवस्थित बनाने में संगठन की भूमिका उल्लेखनीय रही। एक तरह से बीएमएस का दृष्टिकोण सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
वैश्विक मंच पर भारतीय श्रम दृष्टि
भारतीय मजदूर संघ अब सिर्फ राष्ट्रीय संगठन नहीं रह गया है। भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान लेबर-20 (एल-20) में संगठन की सक्रिय भूमिका रही, जहाँ सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक रोजगार तथा कौशल विकास जैसे विषयों पर भारतीय दृष्टिकोण को प्रमुखता मिली। ब्रिक्स ट्रेड यूनियन फोरम में भी बीएमएस ने भारतीय राष्ट्रीय हितों को स्पष्ट रूप से रखा। संगठन का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी श्रमिक संगठनों को राष्ट्रहित से ऊपर किसी वैचारिक या राजनीतिक आग्रह को नहीं रखना चाहिए। यही कारण है कि बीएमएस स्वयं को केवल ट्रेड यूनियन से अधिक राष्ट्रवादी श्रमिक आंदोलन का प्रतिनिधि मानता है।
वैश्वीकरण की चुनौतियों के बीच भारतीय विकल्प
उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद रोजगार का स्वरूप तेजी से बदला। स्थायी नौकरियों की जगह संविदा प्रणाली बढ़ी, गिग अर्थव्यवस्था विकसित हुई और रोजगार की अनिश्चितता नई चुनौती बनकर सामने आई। बीएमएस ने इन परिवर्तनों का विरोध करने के बजाय श्रमिक सुरक्षा को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालने पर बल दिया है।
संगठन लगातार यह कहता रहा है कि तकनीकी परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल अर्थव्यवस्था के युग में श्रमिकों के कौशल उन्नयन, सामाजिक सुरक्षा और गरिमामय रोजगार पर समान रूप से ध्यान देना होगा। यही भविष्य के भारत की श्रम नीति का आधार बन सकता है।
इस तरह यदि सम्यक रूप से देखें तो भारतीय मजदूर संघ का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने श्रमिक आंदोलन को वेतन, बोनस और भत्तों से आगे का रास्ता दिखाया। संगठन ने श्रमिक को राष्ट्र निर्माण की केंद्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। संगठन का विश्वास है कि मजबूत राष्ट्र वही बन सकता है, जहाँ उद्योग प्रतिस्पर्धी हों, श्रमिक सम्मानित हों और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इसी सोच के कारण बीएमएस ने कभी भी श्रमिक हितों को राष्ट्रहित से अलग नहीं माना। उसके लिए श्रमिक का कल्याण, उद्योग की प्रगति और राष्ट्र की समृद्धि, यह तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।
अत: भारतीय मजदूर संघ के स्थापना दिवस पर उसके सात दशकों के योगदान का मूल्यांकन सिर्फ सदस्य संख्या या आंदोलनों से मत लगाइए, उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भारतीय श्रम आंदोलन को एक ऐसी वैचारिक दिशा दी, जिसमें संघर्ष के स्थान पर समरसता, टकराव के स्थान पर संवाद और वर्ग संघर्ष के स्थान पर राष्ट्र निर्माण की भावना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यही विचार आज भी उसे भारत के श्रमिक आंदोलन की सबसे विशिष्ट और प्रभावशाली संस्था बनाता है और साथ में श्रम क्षेत्र का सबसे बड़ा संगठन भी।
