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सिर्फ मैरिज रजिस्ट्रेशन से नहीं मानी जाएगी हिंदू शादी वैध, सात फेरे जरूरी; गुजरात हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

नई दिल्ली। हिंदू विवाह को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल विवाह का रजिस्ट्रेशन करा लेने से शादी कानूनी रूप से वैध नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह को वैध माने जाने के लिए निर्धारित धार्मिक रीति-रिवाजों और संस्कारों का पालन अनिवार्य है। यदि परंपरा के अनुसार सप्तपदी (सात फेरे) विवाह का हिस्सा है, तो सातवां फेरा पूरा होने के बाद ही विवाह पूर्ण और कानूनी रूप से मान्य माना जाएगा।

ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय की अपील से जुड़ा मामला

यह मामला ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय नागरिक कौशल की ओर से दायर अपील से संबंधित है। कौशल का दावा था कि संबंधित महिला के साथ उनका कभी विधिवत विवाह नहीं हुआ और न ही दोनों ने पति-पत्नी के रूप में साथ जीवन बिताया। इसके बावजूद महिला ने विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर स्वयं को उनकी पत्नी बताया।

इस विवाद में फैमिली कोर्ट ने पहले विवाह को शून्य घोषित करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद कौशल ने इस आदेश को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति इलेश जे. वोरा और न्यायमूर्ति आर. टी. वच्छानी की खंडपीठ ने की। अदालत ने पूरे रिकॉर्ड और हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का विस्तार से परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान अदालत को ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि विवाह आवश्यक धार्मिक विधियों और संस्कारों के साथ संपन्न हुआ था।

धारा 7 और धारा 8 का अंतर समझाया

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 और धारा 8 के बीच स्पष्ट अंतर बताया। अदालत के अनुसार, धारा 7 विवाह संपन्न करने की आवश्यक धार्मिक प्रक्रिया से संबंधित है। यदि संबंधित समुदाय की परंपरा में सप्तपदी शामिल है, तो सातवां फेरा पूरा होने के बाद ही विवाह पूर्ण माना जाएगा।

वहीं, धारा 8 केवल पहले से विधिवत संपन्न विवाह के पंजीकरण की व्यवस्था करती है। इसका उद्देश्य विवाह का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करना है, न कि किसी ऐसे विवाह को वैध ठहराना जिसमें आवश्यक धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी नहीं हुई हों।

फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द

इन तथ्यों के आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का पूर्व आदेश निरस्त कर दिया और संबंधित विवाह को शून्य (Void) घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि केवल विवाह प्रमाणपत्र या रजिस्ट्रेशन किसी हिंदू विवाह को कानूनी वैधता प्रदान नहीं कर सकता, जब तक कि अधिनियम के अनुसार आवश्यक धार्मिक संस्कार पूरे न किए गए हों।

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