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अमेरिकी टैरिफ कटौती में भारत से ज्यादा अमेरिका का हित

By: डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति में कई बार फैसले तत्काल फायदे से अधिक दूरगामी मजबूरियों का नतीजा होते हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर पारस्परिक टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करना भी ऐसा ही एक निर्णय है, जिसे सतही तौर पर भारत के पक्ष में बड़ी जीत माना जा रहा है, किंतु गहराई से देखने पर यह कदम अमेरिका के अपने घरेलू हितों, खासकर महंगाई से जूझते आम अमेरिकी उपभोक्ताओं को राहत देने की मजबूरी का परिणाम अधिक नजर आता है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत का धैर्य, संतुलित कूटनीति और दीर्घकालिक सोच आखिरकार रंग लाती दिखाई दी है।

पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने टैरिफ को एक राजनीतिक और रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के तहत चीन, वियतनाम, बांग्लादेश और यहां तक कि भारत जैसे मित्र देशों पर भी भारी शुल्क लगाए गए। उद्देश्य इसके पीछे जो दिखा, वह घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और आयात को महंगा कर अमेरिकी उद्योगों को संरक्षण देना रहा लेकिन व्यवहार में इसका असर उल्टा पड़ा। ऊंचे टैरिफ का सीधा बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ा, महंगाई बढ़ी और सप्लाई चेन में अस्थिरता आई। आज जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था महंगाई के दबाव से कराह रही है, तब ट्रंप प्रशासन को यह समझमें आया कि टैरिफ की यह आक्रामक नीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।

कहना होगा कि यहीं से भारत के प्रति अमेरिकी रुख में बदलाव होता हुआ दिखता है। भारतीय उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत करना आज भारत से अधिक अमेरिकी बाजार में कीमतों को काबू में रखने की एक व्यावहारिक कोशिश भी है। भारत से आने वाले टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स, केमिकल और आईटी सेवाएं अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों के लिए अहम हैं। इन पर ऊंचा शुल्क अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ाता था, जिसका असर सीधे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर पड़ता था। ऐसे में टैरिफ कटौती अमेरिका के लिए अपनी ही अर्थव्यवस्था को राहत देने का रास्ता बन गई।

वैश्विक तुलना करें तो भारत की स्थिति अब कहीं अधिक मजबूत नजर आती है। नए टैरिफ ढांचे में भारत पर 18 प्रतिशत शुल्क है, जबकि इंडोनेशिया पर 19, वियतनाम और बांग्लादेश पर 20 और चीन पर 34 प्रतिशत टैरिफ लागू है। यह अंतर वैश्विक निर्यात प्रतिस्पर्धा में बड़ा बदलाव है। अमेरिकी आयातक स्वाभाविक रूप से कम शुल्क वाले देशों से खरीद बढ़ाने की कोशिश करेंगे और इस दौड़ में भारत अब अपने एशियाई प्रतिद्वंद्वियों से आगे खड़ा दिखेगा। यह बढ़त भारत की मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात रणनीति के लिए बेहद अहम कही जा सकती है।

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा और भू-राजनीति से जुड़ा है। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ हटाया जाना इस बात का संकेत है कि अमेरिका व्यापार नीति को रणनीतिक लक्ष्यों से जोड़कर देख रहा है। अमेरिका के लिए यह फैसला रूस पर दबाव बढ़ाने और अपने सहयोगियों को एकजुट रखने की रणनीति का रूप है, जबकि भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता में रखते हुए संतुलित रुख अपनाया हुआ है।

यहां भारत का धैर्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। रूस-युक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने सस्ते रूसी तेल की खरीद बढ़ाई, क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतें और घरेलू अर्थव्यवस्था इसकी मांग करती थीं। पश्चिमी देशों के कई दबाव आते रहे, बावजूद भारत ने स्पष्ट किया कि ऊर्जा संबंधी फैसले राष्ट्रीय हित और बाजार परिस्थितियों के आधार पर होंगे। यही धैर्य और आत्मविश्वास अंततः भारत के पक्ष में अब आता हुआ दिखता है। पहले भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) का मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) और अब अमेरिका का खुद यह स्वीकार करना कि टैरिफ नीति में लचीलापन जरूरी है, आज यह साबित करता है कि जल्दबाजी के बजाय भारत द्वारा संतुलित कूटनीति उसके पक्ष में कितनी प्रभावी रही है।

इस व्यापार समझौते का सीधा प्रतिबिंब भारतीय शेयर बाजार में देखने को मिला, जहां समझौते के बाद सेंसेक्स और निफ्टी में ऐतिहासिक तेजी दर्ज की गई। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी जबरदस्त उछाल दिखा है। ऑटो, आईटी, फार्मा, बैंकिंग और मेटल जैसे सेक्टर्स में निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। यह बाजार प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि निवेशक इस फैसले को भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक वृद्धि के लिए सकारात्मक मान रहे हैं।

एक्सिस सिक्योरिटीज जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट भी यही कहती है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता चालू खाते के घाटे को कम करने, रुपये को स्थिर रखने और बाहरी झटकों के प्रति भारत की संवेदनशीलता घटाने में मदद करेगा। बेहतर बाजार पहुंच और टैरिफ में स्थिरता से निर्यात बढ़ेगा, मैन्युफैक्चरिंग में निवेश आएगा और एफडीआई को मजबूती मिलेगी। खासकर वे सेक्टर, जिनकी अमेरिकी बाजार में मजबूत मौजूदगी है, उन्हें दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।

इसके साथ ही यहां जो अभी सिर्फ भारत के हित में निर्णय को मान रहे हैं, उन्‍हें समझना होगा कि ये निर्णय भारत से ज्यादा अमेरिका के अपने हित में है, क्‍योंकि अमेरिका इस समय महंगाई और आर्थिक दबाव से गुजर रहा है, उसमें सस्ते और भरोसेमंद आयात के लिए भारत एक बड़ा, स्थिर और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता है। टैरिफ घटाकर अमेरिका ने अपने उपभोक्ताओं को राहत दी है, वो सप्लाई चेन को भी स्थिर करना चाह रहा है और चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह रणनीतिक रूप से अमेरिका के लिए बेहद जरूरी है।

भारत के लिए यह फैसला किसी एकतरफा रियायत से अधिक उसकी लगातार बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वाभाविक परिणति है। ‘मेड इन इंडिया’, पीएलआई स्कीम, निर्यात बढ़ाने की नीति और बहुपक्षीय कूटनीति ने भारत को उस मुकाम पर पहुंचाया है, जहां दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं उसके साथ साझेदारी को मजबूरी नहीं, अवसर के रूप में देख रही हैं।

ऐसे में कहना यही होगा कि अमेरिका द्वारा टैरिफ घटाने का निर्णय एक अच्छा और व्यावहारिक फैसला है, इसके माध्‍यम से अमेरिका अपने नागरिकों को महंगाई की आग से बचाने की कोशिश में सफल हो सकता है। भारत के लिए यह पूरी तरह हितकारी है। निश्‍चित ही ये निर्णय भारत के धैर्य, संतुलन और दीर्घकालिक सोच की जीत है। सच ही कहा गया है कि जब आप धैर्य बनाए रखते हैं तब उस स्‍थ‍िति में अंतत: समय अपना परिणाम धैर्यवान के पक्ष में ही देता है। फिलहाल अमेरिका-भारत टैरिफ प्रकरण में आज यही सच्चाई सामने खड़ी नजर आती है।


(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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