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हिंदू होने का मर्म है विविधता में एकता और आत्मभूतेषु भाव

हिंदू होने का मर्म है विविधता में एकता और आत्मभूतेषु भाव

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By: -------------- भारत एक देश होने के साथ ही एक चेतना है, एक संस्कार है, एक जीवन दृष्टि है। यह वह भूमि है जहां हजारों वर्षों से मानवता को जीने की कला सिखाई गई, जहां विविधता को शक्ति के रूप में देखा गया और जहां अंत:चेतना को ही एकता के लिए समाज की आधारशिला बनाया गया। इसी भारत के स्‍व को स्वर देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आज जो कहा है, वह हम सभी के लिए गहन रूप से विचारणीय है। वस्‍तुत: ये भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाला वैचारिक उद्घोष है। जिसमें कि उनके शब्द हर हिंदू, हर सनातनी और हर भारतवासी के भीतर यह भाव जगाते हैं कि इस राष्ट्र का चरित्र हमारे आचरण से बनता है और इसकी जिम्मेदारी हमारे कंधों पर है। डॉ. भागवत का यह कथन है कि भारत एक भौगोलिक इकाई से ऊपर एक चरित्र है, जोकि भारतीय सभ्यता के मूल स्वभाव को रेखांकित करता है। भारत की पहचान उसकी ...
स्क्रीन के उजाले में बुझती युवा संवेदनाएँ

स्क्रीन के उजाले में बुझती युवा संवेदनाएँ

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डॉ. संध्‍या एस चौकसे आज का भारत युवाओं का भारत है। यही युवा देश की रीढ़ हैं और भविष्य की नींव भी, किंतु विडंबना यह है कि जिन हाथों में कलम किताबें औजार और रचनात्मकता होनी चाहिए, उन्हीं हाथों में आज हर पल एक चमकती हुई स्क्रीन दिखाई देती है। मोबाइल फोन! जिसने दुनिया को हमारी मुट्ठी में समेट दिया, वही अब हमारी संवेदनाओं संबंधों और संतुलन को चुपचाप निगलता जा रहा है। ऐसे में आज मोबाइल आधुनिकता का प्रतीक भर नहीं रहा है, वह घटती मानवीय संवेदनशीलता का सबसे स्पष्ट चेहरा बन चुका है। हाल के वर्षों में मोबाइल से जुड़ी हिंसक और आत्मघाती घटनाएँ समाज को झकझोरने वाली हैं। ओडिशा के जगतसिंहपुर में 21 वर्षीय छात्र द्वारा मोबाइल देखने से रोके जाने पर अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर देना। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में किशोर का अपने माता-पिता पिता द्वारा हर वक्त मोबाइल में डूबे रहने से मना किए जा...
भारतीय सेना: युद्धभूमि में अडिग, संकट में राष्ट्र का संबल

भारतीय सेना: युद्धभूमि में अडिग, संकट में राष्ट्र का संबल

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- योगेश कुमार गोयल भारतीय सेना: युद्धभूमि में अडिग, संकट में राष्ट्र का संबल प्रतिवर्ष 15 जनवरी को भारतीय सेना दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष हम 78वां सेना दिवस मना रहे हैं। सेना दिवस के अवसर पर पूरा देश थलसेना के अदम्य साहस, जांबाज सैनिकों की वीरता, शौर्य और उनकी शहादत को याद करता है। इस विशेष अवसर पर जवानों के दस्ते और अलग-अलग रेजीमेंट की परेड के अलावा झांकियां भी निकाली जाती हैं और उन सभी बहादुर सेनानियों को सलामी दी जाती है, जिन्होंने देश और लोगों की सलामती के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। 15 जनवरी को यह दिवस मनाए जाने का विशेष कारण यह है कि 1899 में कर्नाटक के कुर्ग में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल केएम करियप्पा आज ही के दिन वर्ष 1949 में भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ बने थे। उन्होंने 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश जनरल फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान संभाली थी। जनरल बुचर भारत के आखिरी ब...
अयोध्या श्री राम मंदिर: वैश्विक शांति और समृद्धि की नींव

अयोध्या श्री राम मंदिर: वैश्विक शांति और समृद्धि की नींव

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-पंकज जगन्नाथ जयस्वाल अयोध्या, 14 जनवरी | 22 जनवरी, 2024 को दुनिया भर के लाखों लोगों ने **रामलला** की प्राण प्रतिष्ठा में भाग लिया, जिसने **भारत** के आध्यात्मिक पुनर्जागरण की शुरुआत की। **श्री राम** की जन्मभूमि **अयोध्या** सिर्फ एक शहर से कहीं ज़्यादा है; यह एक कालातीत, आध्यात्मिक गूंज है। यह **श्री राम** के धर्म, सत्य, बलिदान और आदर्श जीवन के प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है। **अयोध्या** भारतीय संस्कृति, **सनातन धर्म**, शाश्वत भक्ति और **भारत** को "विश्वगुरु" बनाने के लिए दुनिया में शांति लाने के मार्ग के रूप में एक प्रकाश स्तंभ की तरह खड़ा है, जबकि हाल ही में निर्मित **राम मंदिर** आध्यात्मिक चमक से जगमगा रहा है। श्री राम मंदिर हिंदू दर्शन और संस्कृति की भव्यता को दर्शाता है। इसका विस्तृत डिज़ाइन, जो प्राचीन भारत की कलात्मक और स्थापत्य प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करता है, पारंपरिक भारतीय कौशल,...
नहीं थम रहा बंगलादेश में हिन्दुओं की हत्या का दौर

नहीं थम रहा बंगलादेश में हिन्दुओं की हत्या का दौर

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-रमेश शर्मा बंगलादेश, 14 जनवरी । बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों और उनकी बर्बर हत्याओं का दौर रुक नहीं रहा। इसमें हिन्दू स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार का अध्याय भी जुड़ गया है। लेकिन भारत के अधिकांश राजनीतिक दल चुप हैं जिन्हें आतंकवादियों के भी मानवाधिकार की चिंता रहती है। पिछले सप्ताह काँग्रेस नेता जयराम रमेश और के वेणुगोपाल तो मीडिया से बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्या का प्रश्न सुनकर ही भाग निकले। यह वही बंगलादेश है जिसके निवासियों को कभी अपनी बांग्ला संस्कृति पर गर्व होता था और बांग्ला संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष किया था। उनके संघर्ष को सार्थक करने के लिए भारत ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। 1971 का युद्ध भी झेला था। इसमें भारत के लगभग 3900 जवानों का बलिदान हुआ था और लगभग 10,000 सैनिक घायल हुए थे। लाखों करोड़ का वित्तीय भार पड़ा सो अलग। बंगलादेश यदि अस्तित्व में आया है ...
मकर संक्रांतिः सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व

मकर संक्रांतिः सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व

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मृत्युंजय दीक्षित मकर संक्रांति के मौके पर जब सूर्यदेव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह पर्व मनाया जाता है। यह पर्व सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने का पर्व माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान, श्रद्धा, तर्पण आदि विधियों का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस दिन दिया गया दान सौ गुना बढ़कर मिलता है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि का दान किया जाता है, और गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है। इस पर्व से संबंधित पौराणिक कथाएं भी हैं, जैसे भगवान भास्कर का अपने पुत्र शनिदेव से मिलने जाना और महाभारत के समय भीष्म पितामह का इसी दिन देह त्याग करना। इस दिन गंगाजी ने भगीरथ के साथ कपिल मुनि के आश्रम से सागर में जाकर मिलने का कार्य किया था। इसके अलावा, भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी, इसलिए इसे सकारात्मक...
मकर संक्रांति त्योहार के पीछे के वैज्ञानिक सिद्धांत

मकर संक्रांति त्योहार के पीछे के वैज्ञानिक सिद्धांत

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-पंकज जगन्नाथ जयस्वाल। हर साल 14 जनवरी को मनाए जाने वाले मकर संक्रांति के त्योहार का महत्व भारतीय सौर कैलेंडर के अनुसार है। यह त्योहार भारतीय संस्कृति में खगोलीय घटनाओं और कृषि चक्रों से जुड़ा हुआ है। मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का संकेत देती है, जो सर्दियों के अंत और फसलों की कटाई की शुरुआत का प्रतीक है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस दिन को विभिन्न नामों से मनाया जाता है, जैसे कि उत्तरी भारत में लोहड़ी, असम में भोगली बिहू, और दक्षिण भारत में पोंगल। इस दिन तिल और गुड़ से बने लड्डू का विशेष महत्व है, जो सर्दियों के मौसम में स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस उत्सव को सामाजिक समरसता और छुआछूत के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाता है, और आधुनिक परिवेश में पर्यावरण की रक्षा के लिए बायोडिग्रेडेबल पतंग उड़ाने जैसी प्रथाओं को अपनाता है। मकर संक्रांति न...
पं. विद्यानिवास मिश्रः भारतीय चिंतन धारा के अप्रतिम व्याख्याकार

पं. विद्यानिवास मिश्रः भारतीय चिंतन धारा के अप्रतिम व्याख्याकार

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शहर, 12 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। पं. विद्यानिवास मिश्र, भारतीय चिंतन के अप्रतिम व्याख्याकार, ने अपने विचारों और साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक नई दिशा दी। उनके कार्य ने भारतीय विचारधारा को पुनर्स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विद्यानिवास मिश्र का जीवन और चिंतन पाश्चात्य प्रभाव के बावजूद भारतीय परंपरा की समृद्धि को उजागर करता है। उनके लेखन में धर्म, लोक, शास्त्र और आधुनिकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों की गहराई से व्याख्या की गई है। मिश्र जी का मानना था कि मानव विकास का असली उद्देश्य मनुष्य को अधिक मानव बनाना है, और उन्होंने इसे अपने कार्यों में प्रतिबिंबित किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की महत्ता को समझाते हुए यह बताया कि मनुष्य और प्रकृति के बीच एक सहकारी संबंध होना चाहिए, न कि एक प्रतिस्पर्धात्मक। उनकी सोच आज के वैश्विक संदर्भ में भी प्रासंगिक है, जहां मानवता को एकजुट होने औ...
एआई में नवाचार से नेतृत्व की ओर बढ़ता भारत

एआई में नवाचार से नेतृत्व की ओर बढ़ता भारत

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शहर, 09 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। लेखक: LN Star News वर्ष 2026 के आरंभ में भारत एक ऐसे निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता देश की तकनीकी दिशा तय करने वाला प्रमुख आधार बन रही है। यह परिवर्तन किसी एक नीति, संस्था या कंपनी का परिणाम नहीं है। यह भारत की सामूहिक बौद्धिक शक्ति, युवाओं की उद्यमशील सोच और एक स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टि का परिणाम है। जिस वैश्विक एआई प्रतिस्पर्धा में भारत कुछ वर्ष पहले तक दर्शक की भूमिका में माना जाता था, उसी मंच पर आज वह अग्रणी दावेदार के रूप में उभर रहा है। वस्तुत: स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी रिपोर्ट में भारत का सातवें स्थान से सीधे तीसरे स्थान पर पहुँचना इस बदलाव का ठोस प्रमाण है। अमेरिका और चीन के बाद भारत का नाम आना यह दर्शाता है कि भारतीय प्रतिभा, स्टार्टअप संस्कृति और तकनीकी सोच अब वैश्विक स्तर पर गंभीरता से ली जा र...
भारत में वामपंथी वैचारिकी, विश्वविद्यालयी आंदोलन और नक्सली समर्थन

भारत में वामपंथी वैचारिकी, विश्वविद्यालयी आंदोलन और नक्सली समर्थन

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शहर, 09 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। लेखक: LN Star Newsभारत का लोकतंत्र अपनी विविधता, मतभिन्नता और खुली बहस की परंपरा के कारण विश्व में विशिष्ट रहा है। किंतु पिछले दो दशकों में एक ऐसी वैचारिक धारा विकसित हुई है, जिसने विश्वविद्यालयों, वामपंथी छात्र संगठनों, शहरी बुद्धिजीवी समूहों और माओवादी हिंसा को व्यापक वैचारिक सूत्र में पिरो दिया है। यह विमर्श केवल छात्र-राजनीति या असहमति तक सीमित नहीं; यह राज्य-विरोध, पहचान की राजनीति, ‘क्रांतिकारी प्रतिरोध’ की संस्कृति और अंततः माओवादी सशस्त्र संघर्ष तक फैला सुनियोजित नैरेटिव बन चुका है। सबसे स्पष्ट उदाहरण दिल्ली के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय- जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया तथा हैदराबाद एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय हैं, जहाँ विमर्श का झुकाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय दृष्टिकोण से हटकर एक प्रकार के वैचारिक अराजकवाद की ओर दिखाई देता है। जेएनयू में एसएफआई, एआईएसए, डी...