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सावन : आस्था, प्रकृति और शिव भक्ति का पावन संगम

सावन : आस्था, प्रकृति और शिव भक्ति का पावन संगम

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उदय कुमार सिंह भारतीय सनातन संस्कृति में श्रावण मास, जिसे सामान्य रूप से सावन कहा जाता है, धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वर्ष का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। वर्षा ऋतु के मध्य आने वाला यह महीना केवल प्राकृतिक सौंदर्य और हरियाली का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि भक्ति, तप, संयम, लोकजीवन और सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि सावन का प्रत्येक दिन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष फलदायी होता है। यही कारण है कि पूरे महीने देशभर के शिवालयों में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, कांवड़ यात्रा, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों की धूम रहती है। सावन को 'पावस ऋतु' का प्रमुख महीना भी कहा जाता है। इस दौरान वर्षा से धरती हरी-भरी हो जाती है, खेत-खलिहानों में नई जान आ जाती है और प्रकृति अपने सबसे सुंदर स्वरूप में दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति और अध्यात्...
सीजेपी प्रोटेस्ट और युवा : जेन जी को शिक्षा के साथ संस्कार आवश्यक

सीजेपी प्रोटेस्ट और युवा : जेन जी को शिक्षा के साथ संस्कार आवश्यक

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- प्रो. मनीषा शर्मा सीजेपी आंदोलन खत्म हो गया, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में मुझे सबसे ज्यादा चिंता हुई इस युवा पीढ़ी की जो वहाँ उपस्थित थी। उनके आचरण, व्यवहार और प्रयोग की जा रही भाषा सबने एक पालक और शिक्षक होने के नाते मुझे झकझोर कर रख दिया। क्या यह पीढ़ी हमारे देश का भविष्य है? उनकी शिक्षा के विषय में क्या ही बात की जाए। कोई आईएएस की तैयारी कर रहा है, कोई मेडिकल की, कई उच्च शिक्षित थे, कई विद्यार्थी प्रसिद्ध और नामी विवि के थे। मतलब हम इन्हें उच्च शिक्षित कह सकते हैं लेकिन जब सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, रील, मीम्स देखते हैं तो दिमाग जवाब दे जाता है। क्या यह वाकई शिक्षित है? यदि हां तो हम कैसी शिक्षा व्यवस्था चला रहे जो इस पीढ़ी को यह तक ना सिखा पाई कि एक शिक्षित और सभ्य इंसान की भाषा का स्तर क्या होता है। हमारे यहां कहा जाता है...
सीजेपी का प्रदर्शन, क्या अपने मूल उद्देश्य से भटक गया ?

सीजेपी का प्रदर्शन, क्या अपने मूल उद्देश्य से भटक गया ?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी देश में जब ‘नीट’ प्रश्नपत्र लीक का मामला सामने आया तो स्वाभाविक रूप से लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों में गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ। यह उन युवाओं के भविष्य का प्रश्न था जिन्होंने वर्षों की मेहनत, आर्थिक संसाधन और मानसिक ऊर्जा इस परीक्षा की तैयारी में लगाई थी। ऐसे समय में छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति माना जा सकता है। वैसे भी किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को अपनी बात रखने, सरकार से जवाब मांगने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करने का पूरा अधिकार है, किन्तु दिल्ली में पिछले दिनों में जो घटा है, उसे देखने के बाद यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या यह आंदोलन अभी भी छात्रों के भविष्य और शिक्षा सुधार को लेकर हो रहा है? जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के अनेक दृश्य, वहां उठ रहे विभिन्न प्रकार के नारे, अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक संग...
भारतीय मजदूर संघ : 71 वर्षों की राष्ट्रनिष्ठ श्रमिक यात्रा, जिसने श्रम आंदोलन को दिया भारतीय दृष्टिकोण

भारतीय मजदूर संघ : 71 वर्षों की राष्ट्रनिष्ठ श्रमिक यात्रा, जिसने श्रम आंदोलन को दिया भारतीय दृष्टिकोण

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी 23 जुलाई 1955 को स्थापित भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) आज केवल देश का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन होने के नाते भारतीय श्रम दर्शन का सबसे सशक्त प्रतिनिधि है। वस्‍तुत: जब विश्व का श्रमिक आंदोलन पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच संघर्ष की धुरी पर घूम रहा था, तब राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करते हुए श्रम आंदोलन को एक तीसरा मार्ग दिया, जिसके लिए कहा गया, "राष्ट्रहित, उद्योगहित और मजदूरहित" का मार्ग। यही कारण है कि सात दशक बाद भी आज बीएमएस राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों की रचनात्मक भागीदारी का एक सशक्त मंच बनकर खड़ा है। यहां ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारतीय मजदूर संघ का जन्म ऐसे समय हुआ था, जब अधिकांश ट्रेड यूनियनें राजनीतिक दलों अथवा वैचारिक समूहों के प्रभाव में काम कर रही थीं। कहीं वर्ग संघर्ष की कम्युनिस्ट अवधारणा प्रमुख थी तो कहीं श्रमिक आंदोलन राजनीत...
रेप पीड़िता: सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय एक सबक, उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं!

रेप पीड़िता: सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय एक सबक, उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं!

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डॉ. निवेदिता शर्मा गाजियाबाद की चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को इलाज देने से इनकार करने वाले दो निजी अस्पतालों पर सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणी ने सभी देशवासियों का अपनी ओर ध्‍यान खींचा है। पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, पुलिस तंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक संवेदनशीलता पर ऐसे मामले सामने आने पर गंभीर प्रश्न खड़े हो जाते हैं। मु एक तरह से देखें तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस स्पष्टता से कहा कि "यदि आपने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया तो अपने नाम के आगे डॉक्टर लिखने का कोई अधिकार नहीं है," वह उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो अपने पेशे को केवल व्यवसाय समझ बैठे हैं या जो जिम्‍मेदारी उन्‍हें मिली है, उससे जुड़ा वह कार्य जिम्‍मेदारीपूर्वक पूर्ण करना नहीं चाहते। इस घटना में चार वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ। परिजन उसे उपचार क...
संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक : क्या भारत अपनी सांस्कृतिक शक्ति खो रहा है?

संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक : क्या भारत अपनी सांस्कृतिक शक्ति खो रहा है?

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कैलाश चन्द्र संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें बच्चे केवल अपने माता-पिता के साथ नहीं, बल्कि भाई-बहनों, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, दादा-दादी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहते हुए जीवन जीना सीखते हैं। जब तीन-चार बच्चे एक साथ खेलते हैं, साथ बैठकर भोजन करते हैं, अपने खिलौने और वस्तुएँ बाँटते हैं, छोटे-बड़े का ध्यान रखते हैं और छोटी-छोटी बातों पर रूठते-मनाते हैं, तब उनके भीतर बिना किसी औपचारिक शिक्षा के सामाजिक जीवन के संस्कार विकसित होने लगते हैं। वे समझते हैं कि जीवन केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति का नाम नहीं, बल्कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने का भी नाम है। परिवार उन्हें सहयोग, सहिष्णुता, त्याग, धैर्य, अनुशासन, साझेदारी और परस्पर उत्तरदायित्व का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है। इसी वातावरण में परस्पर स्नेह, आत्मीयता, अपनापन और एक-दूसरे का सहारा बनने की भावना स्वाभाविक ...
मानसून की चुनौती: आखिर स्मार्ट शहर भी क्यों हो रहे हैं बेबस?

मानसून की चुनौती: आखिर स्मार्ट शहर भी क्यों हो रहे हैं बेबस?

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- योगेश कुमार गोयल मानसून ने इस वर्ष अपने आगमन के साथ ही देश के बड़े हिस्से में राहत से अधिक आफत का संदेश दिया है। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ से लेकर महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश तक प्रकृति का रौद्र रूप साफ दिखाई दे रहा है। भारी बारिश, भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमारा बुनियादी ढांचा और प्रशासनिक तैयारी अभी भी इस प्राकृतिक चुनौती का सामना करने में सक्षम नहीं है। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में लगातार मूसलाधार बारिश के चलते भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग-244 कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गया है। ऐसी घटनाएं न केवल आवागमन को बाधित करती हैं बल्कि यह भी दिखाती हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण और रखरखाव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव है। महाराष्ट्र के पुणे जिले मे...
मध्य प्रदेश में तकनीक आधारित उद्योग विकास : संदर्भ- ‘एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 3.0’

मध्य प्रदेश में तकनीक आधारित उद्योग विकास : संदर्भ- ‘एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 3.0’

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत में पिछले एक दशक हुए डिजिटल परिवर्तनों ने  राष्ट्रीय विकास के आगे उसे आज अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर विकास की धुरी बनाया है। डिजिटल इंडिया मिशन, इंडिया एआई मिशन, सेमीकंडक्टर मिशन, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों ने देश को नई तकनीकी दिशा दी है। इसी राष्ट्रीय दृष्टि को राज्य स्तर पर गति देने का प्रयास इन दिनों मध्यप्रदेश में होता हुआ देखा जा सकता है, जिसमें कि 'एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 3.0' उसी परिवर्तन का सशक्त प्रतीक बनकर हमारे सामने है। यह सम्मेलन निश्‍चि‍त ही मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उस नई आर्थिक सोच का परिचायक है, जिसमें मध्यप्रदेश स्वयं को कृषि प्रधान राज्य की पारंपरिक छवि से आगे बढ़ाकर भारत के उभरते हुए हाई-टेक औद्योगिक और डिजिटल केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। वस्‍तुत: जैसा कि मुख्‍यमंत्री कई अवसरों पर कहते भी रहे हैं कि वि...
अभाविप : एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन

अभाविप : एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन

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– चेतस सुखाड़िया भारत का छात्र आंदोलन केवल छात्रसंघ चुनावों या शैक्षणिक मांगों तक सीमित नहीं रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रनिर्माण तक विद्यार्थियों ने समय-समय पर अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बदलते समय, शिक्षा के उभरते नए आयाम, तकनीकी क्रांति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में छात्र संगठनों की प्रासंगिकता क्या है? यदि कोई छात्र संगठन समय के साथ स्वयं को समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालते हुए विद्यार्थियों के हितों और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करता है, तो उसकी प्रासंगिकता स्वतः सिद्ध होती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) इसी दृष्टि से भारत का एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन है। जिसने स्वयं को कालसुसंगत बनाते हुए संपूर्ण विद्यार्थी समाज को अपने साथ जोड़ने कार्य कि...
वीबी-जी राम जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत

वीबी-जी राम जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत

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डॉ.लोकेश कुमार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने ग्रामीण सशक्तीकरण को लेकर बड़ा कदम उठाया है, जो एक जुलाई, 2026 से पूरे देश में वीबी-जी राम जी के नाम से लागू होने जा रहा है। मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ( वीबी-जी राम जी) योजना पूरे देश के ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर, समावेशी और सशक्त बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। गांवों से रोजगार की तलाश में शहरों में हो रहे पलायन को रोकने के लिए यह एक कारागार कदम है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने इस योजना में 95 हजार, 692 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया है, जो ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए अब तक का सर्वाधिक आवंटन राशि है। राज्यों के राज्यांश सहित इस कार्यक्रम का कुल परिव्यय 1.51 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने का अनुमान है। ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे प्रत्येक पात्र परिवार को ...