मृत्युंजय दीक्षित

मकर संक्रांति के मौके पर जब सूर्यदेव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह पर्व मनाया जाता है। यह पर्व सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने का पर्व माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान, श्रद्धा, तर्पण आदि विधियों का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस दिन दिया गया दान सौ गुना बढ़कर मिलता है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि का दान किया जाता है, और गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है।
इस पर्व से संबंधित पौराणिक कथाएं भी हैं, जैसे भगवान भास्कर का अपने पुत्र शनिदेव से मिलने जाना और महाभारत के समय भीष्म पितामह का इसी दिन देह त्याग करना। इस दिन गंगाजी ने भगीरथ के साथ कपिल मुनि के आश्रम से सागर में जाकर मिलने का कार्य किया था। इसके अलावा, भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी, इसलिए इसे सकारात्मकता का पर्व माना जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस दिन से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं, और सूर्य का ताप भी बढ़ने लगता है। यह पर्व भारत के विभिन्न हिस्सों में विविध तरीकों से मनाया जाता है। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में इसे दान का पर्व माना जाता है।
भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व के मनाने की खास परंपराएँ हैं। नेपाल में भी इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में, जबकि महाराष्ट्र में महिलाएं एक-दूसरे को तिल, गुड़ और रोली बांटती हैं। बांग्ला में तिल दान करने की पुरानी परंपरा है। इस पर्व का जोश और उल्लास हर जगह दिखाई देता है, और यह हमें एकजुटता और सकारात्मकता का संदेश देता है।
मकर संक्रांति पर हमें इस पर्व के मूल स्वरूप को संरक्षित करने और उपभोक्तावाद से इसे बचाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
