
आज के दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और लगातार बढ़ते सामाजिक दबाव के बीच युवाओं की मानसिक स्थिति एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। निर्देशक कमल चंद्रा की ‘आर्यभट्ट का जीरो’ इसी संवेदनशील विषय को भावनात्मक और प्रेरक अंदाज में पेश करती है। यह सिर्फ एक युवक की सफलता-असफलता की कहानी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, पारिवारिक रिश्तों और खुद पर भरोसा बनाए रखने की सीख देने वाली फिल्म है। लंबे समय बाद हिमांश कोहली एक ऐसे किरदार में नजर आते हैं, जो उनकी अभिनय क्षमता को नए अंदाज में सामने लाता है।
फिल्म की कहानी उत्तराखंड के रहने वाले ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू (हिमांश कोहली) के इर्द-गिर्द घूमती है। साधारण परिवार से आने वाला बग्गू अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता है, लेकिन हर कदम पर उसे असफलताओं का सामना करना पड़ता है। उसकी प्रेमिका रिंकू (सोनाली सेहगल) की शादी एक अफसर से हो जाती है, जिसके बाद वह यूपीएससी पास कर बड़ा अधिकारी बनने का सपना देखता है। हालांकि किस्मत, परिस्थितियां और उसकी अपनी गलतियां बार-बार उसके रास्ते में बाधा बनती हैं। समाज और रिश्तेदार उसे ताने मारते हुए ‘आर्यभट्ट का जीरो’ कहने लगते हैं। ऐसे में क्या बग्गू अपनी हार को जीत में बदल पाएगा? यही सवाल फिल्म को अंत तक रोचक बनाए रखता है।
निर्देशन
निर्देशक कमल चंद्रा ने कहानी को सादगी और ईमानदारी के साथ पेश किया है। फिल्म अनावश्यक ड्रामा से बचते हुए वास्तविक जीवन के करीब रहती है। लेखक तारिक मोहम्मद की पटकथा भावनात्मक है और कई संवाद सीधे दिल को छूते हैं। खास तौर पर पिता-पुत्र के रिश्ते को जिस संवेदनशीलता से दिखाया गया है, वह फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है।
