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मप्र में अधर्म को प्रसारित करने वाला कांग्रेसी जनप्रतिनिधि !

By: – डॉ. मयंक चतुर्वेदी

लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों का कर्तव्य है कि वे समाज को एकजुट करें, उसके लिए अपने स्‍तर पर तमाम प्रयास करें न कि विभाजित करने का षड्यंत्र एवं संवाद स्‍थापित करें, किंतु जब कोई विधायक भारतीय समाज में विभाजन की रेखा तीव्र करे, नारी सम्मान, सामाजिक नैतिकता और देश की सांस्कृतिक चेतना पर सीधा प्रहार करे तब यह कृत्‍य धर्म के स्‍थान पर अधर्म को प्रसारित करने वाला कहलाता है।

वस्‍तुत: मध्य प्रदेश कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया ने दावा किया कि हिंदू ग्रंथों में दलित या आदिवासी महिला के साथ सहवास को तीर्थ यात्रा के फल के समान पुण्य बताया गया है। “खूबसूरत लड़की देखकर पुरुष का दिमाग भटक जाता है, ऐसी घटनाएं हो जाती हैं।” कहना होगा कि ये घटना हिंदू धर्म की परंपराओं के खिलाफ घृणित दुष्प्रचार है। सच यही है कि हिंदू धर्म की मूल चेतना नारी को देवी के रूप में पूजती है। हिन्‍दू सनातन धर्म में ऐसी कोई पुस्‍तक ज्ञात नहीं है, जो इस तरह से महिलाओं के प्रति निकृष्‍ट सोच रखती हो, बल्‍कि जितने भी धार्म‍िक ग्रंथ हैं, उन सभी में नारी की श्रेष्‍ठता का बखान है, यहां तक कि वेदिक काल से लेकर आधुनिक समय तक के ग्रंथ भी मातृ देवो भव: और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः। (मनुस्मृति 3.56) की ही शिक्षा देते हैं।

ऋग्वेद (10.85.46) में कहा गया है, “स्त्री प्रजातिस्त्राणा संनादति” अर्थात् स्त्री सृष्टि का आधार है और उसे रक्षा का अधिकार है। दुर्गा सप्तशती में नारी शक्ति को अधर्म का नाश करने वाली बताया गया है। रामायण में सीता को मर्यादा पुरुषोत्तम राम की अर्धांगिनी मान कर सम्मान दिया गया, जबकि महाभारत के शांतिपर्व (141.44) में बलात्कार को ‘स्त्री हिंसा’ कहकर महापाप घोषित किया गया है। मनुस्मृति (8.352) स्पष्ट कहती है कि स्त्री पर अत्याचार करने वाले को नरक मिलता है।

वस्‍तुत: इन ग्रंथों एवं इसी तरह के अन्‍य धार्म‍िक ग्रंथों में कहीं भी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को पुण्य बताने की कल्पना नहीं। बरैया का दावा कि “किसी ग्रंथ में आदिवासी महिला से सहवास को तीर्थ फल” कहा गया है, पूर्णतः झूठा है। ऐसे में सच यही दिखता, यह जानबूझकर हिंदू धर्म को बदनाम करने की साजिश है, जो महिलाओं के खिलाफ अपराध को सामान्य बनाने का प्रयास करती है।

इस बयान का दूसरा भयंकर आयाम अपराधी की जिम्मेदारी को धुंधला करना है। “खूबसूरत लड़की देखकर दिमाग भटक जाता है” कहना बलात्कार को दुर्घटना बनाता है, जबकि हिंदू दर्शन में भागवद्गीता (6.26) संयम और आत्मनियंत्रण को परम धर्म बताता है। “इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।” अर्थात् इंद्रियों को नियंत्रित न करने वाला मूर्ख है। नारी को दोषी ठहराना न भारतीय संस्कृति है, न हिंदू ज्ञान अथवा अन्‍य परंपरा का। वस्‍तुत: यह विकृत मानसिकता है।

इस पूरे घटनाक्रम में आज सवाल कांग्रेस पर भी खड़े होते हैं, यदि पार्टी महिलाओं और एससीएसटी हितों के प्रति गंभीर होती तो ऐसे विधायक को तत्काल निष्कासित करती। वस्‍तुत: यह चुप्पी पार्टी की वैचारिक कमजोरी दर्शाती है। वैसे, कांग्रेस का हिंदू-विरोध ऐतिहासिक रुप से बहुत पुराना है। इस घटना ने एक बार उसकी याद दिला दी है; 1980 के दशक में राजीव गांधी ने बोफोर्स कांड के बाद शिलान्यास विवाद खड़ा किया। साल 2014 में दिग्विजय सिंह ने राम को काल्पनिक कहा। साल 2019 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध लगाया और साल 2024 में मध्य प्रदेश कांग्रेस ने ‘हिंदुत्व फासीवाद‘ का नारा दिया। अब ग्रंथों पर बलात्कार के आरोप जोड़ कर बहुसंख्यक समाज को अपराधबोध में डालने की कोशिश हो रही है!

पहले स्‍वयं राहुल गांधी हिंदुत्व को गलत तरीके से चित्रित करते हुए दिखते हैं, अब उनके पदचिन्‍हों पर उनके विधायक चल रहे हैं। वास्‍तव में हिंदुत्व सहअस्‍तित्‍व और सर्वसमावेशी है, विवेकानंद के शब्दों में सभी धर्मों का सम्मान यानी हिन्‍दू धर्म (हिन्दुत्व) है। स्वामी विवेकानंद के शब्‍दों में “नारी का स्थान सर्वोच्च है”। महर्षि अरविंद ने लिखा, “भारतीय संस्कृति में माता सर्वोपरि।” ऐसे में निश्‍चित तौर पर कांग्रेस विधायक बरैया जैसों के बयानों का विरोध हर सांस्कृतिक व्यक्ति का कर्तव्य है। नए कानूनों में भी इस तरह के वक्‍तव्‍यों की सजा कम से कम तीन वर्ष तक सुनिश्‍चित है और एससी/एसटी एक्ट 3(1)(एक्‍स) महिलाओं के अपमान पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करता है। विधायक अपराध से मुक्‍त नहीं है। यह समझने की आज सभी को जरूरत है।

अंत में यही कहना है कि हिंदू समाज सहिष्णु है, किंतु इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि वो अपमान सहन करे। नारी देवी है, उसे राजनीतिक औजार न बनाएं। भारत के किसी धर्मग्रंथ में बलात्कार को प्रोत्साहन नहीं; इसलिए इस झूठे नैरेटिव का कड़ा विरोध आवश्यक है।


सूचना: यह लेख हमारे विशेष संपादकीय डेस्क द्वारा गहन शोध और तथ्यों के सत्यापन के बाद तैयार किया गया है।

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