Friday, March 6खबर जो असर करे |
Shadow

लेख

मध्यप्रदेश में निवेश, नवाचार और रोज़गार के संकल्प का अभ्युदय

मध्यप्रदेश में निवेश, नवाचार और रोज़गार के संकल्प का अभ्युदय

मध्य प्रदेश, लेख
डॉ. मोहन यादव मध्यप्रदेश आज अपनी स्थापना के 70वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। एक नवंबर 1956 को अस्तित्व में आये मध्यप्रदेश में विकास की नई यात्रा विगत दो दशकों से आरंभ हुई, जो प्रदेश को देश में अग्रणी राज्य बनाने की संभावनाओं तक पहुंच गई है। यह सुखद संयोग है कि आज देवउठनी ग्यारस के पावन अवसर पर राज्योत्सव का आयोजन किया जा रहा है। हमारे तीज, त्यौहार और परंपराएं हमारी संस्कृति का आधार हैं। उत्सव के आनंद से ही भविष्य निर्माण के भाव निर्मित होते हैं। मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता है कि प्रदेश में सभी त्यौहारों को व्यापक स्वरूप में मनाया जा रहा है। अपने त्यौहारों का सांस्कृतिक संदर्भ ही हमें पुरातन से नूतन की प्रेरणा देता है। हमारे लिए गर्व की बात है कि भारत का ह्दय मध्यप्रदेश वन, जल, अन्न, खनिज, शिल्प, कला, संस्कृति, उत्सव और परंपराओं से समृद्ध है। हमें मां नर्मदा, चंबल, पार्वती, शिप्रा...
क्या ट्रंप नोबेल में मात के बाद भी शांति दूत बने रहेंगे?

क्या ट्रंप नोबेल में मात के बाद भी शांति दूत बने रहेंगे?

लेख
ऋतुपर्ण दवे बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले ट्रंप हाथ मलते रह गए। शांति के नोबेल के लिए चंद देशों से खुद को नामित कराने वाले अड़ीबाज अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रप के मुकाबले बेहद कम चर्चित और दुनिया में अलग पहचान रखने वाली एक महिला को मिलना शायद ट्रंप को उनकी असलियत या औकात बताने को काफी है। वैसे भी हर पुरस्कार के लिए नियम होते हैं, लंबी फेहरिस्त होती है और कारण होते हैं। ट्रंप कहीं से भी इसमें फिट नहीं बैठते थे। लेकिन उन्हें अमेरिका का राष्ट्रपति होने का गुमान था। इसीलिए वो यह जानते हुए भी कि पुरस्कार के लिए नामित होने और औपचारिकताओं के पूरा करने की प्रक्रिया को भी शायद अपनी धौंस से धता बताने की जुगाड़ में थे, जो हो न सका। यह भी सच है कि शायद यह पहला मौका होगा जब पुरस्कार मिलने वाले के नाम की चर्चा के बजाए न मिलने वाले का नाम और उसका रंज सु...
बड़ा मायने है पर्यटन में मध्‍य प्रदेश का वैश्‍विक रूप से हृदय जीत लेना !

बड़ा मायने है पर्यटन में मध्‍य प्रदेश का वैश्‍विक रूप से हृदय जीत लेना !

लेख
डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्य प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह पर्यटन के क्षेत्र में अपनी सशक्त पहचान बनाई है, वह नीतियों और प्रचार अभियानों के साथ दृष्टि और निरंतरता का प्रतीक है। भारत के हृदय में स्थित यह प्रदेश आज देश-विदेश के यात्रियों के लिए भरोसे और अनुभव दोनों का केन्द्र बन गया है। महामारी के बाद जब वैश्विक पर्यटन उद्योग पुनर्जीवन की राह खोज रहा था, तब मध्यप्रदेश ने योजनाबद्ध ढंग से अपनी साख दोबारा कायम की। पर्यटन के हर आयाम में यहां नई हलचल दिख रही है। कभी विरासत और वन्यजीव के लिए पहचाने जाने वाला यह प्रदेश आज वेडिंग, एमआईसीई, फिल्म और ग्रामीण पर्यटन जैसे क्षेत्रों में देशव्यापी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भोपाल में हुए एमआईसीई एवं वेडिंग टूरिज्म सम्मेलन में देशभर के विशेषज्ञों ने माना है कि मध्यप्रदेश आयोजनों का नया केन्द्र बनकर उभर रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि राज्य भौ...
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध और अलौकिक अनुभव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध और अलौकिक अनुभव

लेख
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) विष्णु कांत चतुर्वेदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विजयादशमी के पावन पर्व पर अपनी एक शताब्दी की यात्रा पूरी कर ली है। हम सब ने बहुत कुछ जाने-अनजाने में इस संस्था के कार्य और उनकी संरचना के बारे में सुना है या फिर स्वयं भी किसी न किसी रूप में अनुभव किया है। मेरा भी इस संगठन से जुडाव कुछ इसी प्रकार हुआ। मैं 31 मई 2011 को भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुआ। तब तक, मैने इस संगठन के बारे में केवल अखबारों में, पत्रिकाओं में या फिर कभी किसी राजनीतिक चर्चाओं में सुना था। मैं अब यह कह सकता हूं कि एक ऐसा संगठन जिसने अपने आप को केवल मानवता और राष्ट्र को समर्पित कर दिया, मैं स्वयं सेना की नौकरी में कार्यान्वित होने के कारण इस संगठन के उत्कृष्ट कार्यो से अनभिज्ञ रहा। ऐसा भी नहीं, कि मैंने अपने सेना के सेवाकाल में, इस संगठन के कार्यों का अनुभव नहीं किया, लेकिन कभी ध्यान ही नह...
घोष केवल संगीत और वादन नहीं, यह साधना है

घोष केवल संगीत और वादन नहीं, यह साधना है

लेख
नितिन गर्गे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जब भी पथ संचलन निकलता है, तब घोष उसका सौंदर्य बढ़ाता है। संघ कार्य का यह शताब्दी वर्ष है। इन 100 वर्षों में जिस प्रकार संघ का क्रमिक विकास हुआ है, उसी प्रकार संघ के घोष का भी क्रमिक विकास हुआ है। दिसंबर, 1926 में जब संघ का पहला पथ संचलन निकला था, तब घोष में केवल एक आनक और एक शंख ही शामिल हुआ था। घोड़े पर चढ़कर पहले सरसेनापति मार्तंड राव जोग आगे चलते थे तथा पीछे बिगुल वादक एवं स्वयंसेवक संचलन करते थे। विगत 100 वर्षों में यह यात्रा घोष की बड़ी और समृद्ध इकाई तक पहुँच गई है। घोषदल की इकाई में पणव (बास ड्रम), आनक (साइड ड्रम), शंख, वंशी, झल्लरी (झांझ), ट्राइंगल (त्रिभुज ), नियंत्रण और संकेत के लिए घोषदंड शामिल रहता है। आरएसएस का मत है कि घोष केवल संगीत का माध्यम नहीं, बल्कि यह वीरता, पराक्रम और राष्ट्रनिर्माण की भावना का प्रतीक है। शंख, ढोल और रणभेर...
गहन चोट से शब्दों का अभाव

गहन चोट से शब्दों का अभाव

लेख
हृदयनारायण दीक्षित राष्ट्र स्तब्ध है। देश की सर्वोच्च न्यायपीठ के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंके जाने की घटना से जन गण मन आहत है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने अब तक घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। अब उन्होंने कहा है कि, ”जो कुछ हुआ उससे बहुत स्तब्ध था।” मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि उनके सहयोगी न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां ने इससे भिन्न राय प्रकट की है। यह अच्छी बात है कि मुख्य न्यायाधीश ने इसे एक भुला दिया गया अध्याय बताया है, लेकिन देश में इस घटना पर अच्छी खासी बहस है। भुइयां ने कहा है, “इस पर मेरी अपनी राय है। वह भारत के चीफ जस्टिस हैं। यह उच्चतर संस्था का अपमान है।” राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित इस घटना ने कई दिशाओं में नया सोचने की आवश्यकता प्रकट की है। घटना की गंभीरता का पता इसी बात से चलता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी घटना की न...
घुसपैठ का गहराता संकट, ग्वालियर की घटना से बड़ा सबक लेने की जरूरत

घुसपैठ का गहराता संकट, ग्वालियर की घटना से बड़ा सबक लेने की जरूरत

लेख
डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के ग्वालियर से हाल ही में सामने आया बांग्लादेशी नागरिकों का मामला एक पुलिस कार्रवाई भर नहीं है; यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, जनसंख्या संतुलन और प्रशासनिक चौकसी पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। महाराजपुरा एयरबेस जैसे संवेदनशील क्षेत्र के पास बिना वैध दस्तावेजों के बारह वर्षों तक आठ बांग्लादेशी नागरिकों का रहना इस ओर संकेत करता है कि अवैध विदेशी घुसपैठ सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रही, अब यह देश के भीतर गहराई तक फैल चुकी है। गुजरात में सबसे बड़ी कार्रवाई अप्रैल 2025 में हुई, जब सूरत और अहमदाबाद से हजारों संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने पाया कि ये लोग वर्षों से फर्जी पहचान पत्रों और किरायेदारी के आधार पर रह रहे थे। हरियाणा के गुरुग्राम में भी सैकड़ों अवैध घुसपैठियों को पकड़ा गया, जिनमें बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक शामिल थे। ...
आपातकाल के 50 वर्ष : यह अराजकता और तानाशाही का काला दौर था

आपातकाल के 50 वर्ष : यह अराजकता और तानाशाही का काला दौर था

लेख
यह इंदिरा की सबसे बड़ी गलती थी, सत्ता पर काबिज रहने के लिए की थी लोकतंत्र की हत्या : रामपाल सिंह रामानुज शर्मा नई दिल्ली, 09 अक्टूबर (हि.स.)। आपातकाल को अगर बर्बर, अराजकता और तानाशाही के काले दौर की संज्ञा दी जाये तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह ऐसा वक्त था, जिसमें पुलिस और प्रशासन निरंकुश था। किसी की कोई सुनवाई नहीं थी। ऐसा लगता था कि हम लोकतांत्रिक देश में नहीं, अपितु एक गुलाम देश में रह रहे हों। यह इंदिरा की सबसे बड़ी गलती थी। सत्ता पर काबिज रहने के लिए उन्होंने लोकतंत्र की हत्या की थी। आपातकाल को बर्बर, अराजकता और तानाशाही का काला दौर करार देते हुए अमोद अरोड़ा बताते हैं कि यह ऐसा वक्त था जिसमें पुलिस और प्रशासन निरंकुश था। किसी की कोई सुनवाई नहीं थी। ऐसा लगता था कि हम लोकतांत्रिक देश में नहीं अपितु एक गुलाम देश में रह रहे हों। वे कहते हैं कि आपातकाल का विरोध करने वा...
सीजेआई गवई और राकेश किशोर मामला कहां जाकर थमेगा

सीजेआई गवई और राकेश किशोर मामला कहां जाकर थमेगा

लेख
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसके संविधान और न्यायपालिका में बसती है, जहां समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आदर्शों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वस्‍तुत: सर्वोच्च न्यायालय को इसी आत्मा का रक्षक कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या यह रक्षक संस्था सभी समुदायों के लिए समान रूप से न्यायसंगत है? जब मुद्दे बहुसंख्यक समाज, हिन्दू परंपराओं या सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े होते हैं, तो न्यायिक रवैया अक्सर असहज और असंतुलित दिखाई देता है। जनहित याचिका : उद्देश्य से औपचारिकता तक भारत में जनहित याचिका (पीआईएल) की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी ताकि समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को भी न्याय का दरवाजा खुला मिले। ‘लोकस स्टैंडी’ की दीवार को तोड़कर सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिकों को न्याय की प्रक्रिया में भागीदार बनाया। किंतु धीरे-धीरे यह औजार राजनीत...
संघ के 100 सालः बूंद-बूंद सागर बना

संघ के 100 सालः बूंद-बूंद सागर बना

लेख
मनोज कुमार मिश्र इस विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्थापना के सौ स्वर्णिम साल पूरे हो गए। सौ साल पहले डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने कुछ साथियों के साथ राष्ट्र जागरण के संकल्प के साथ संघ के रूप में एक दीप जलाया था। इन सौ सालों में वह अखंड ज्योति बन कर भारत की आत्मा को आलोकित कर रहा है। उसकी मजबूत उपस्थिति आज समाज के हर क्षेत्र में है। संघ के मौजूदा सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने कई बार दोहराया है कि संघ में सबकुछ परिवर्तनशील है, सिवाय इस मूल विश्वास के कि भारत हिन्दू राष्ट्र है। संघ हिन्दू समाज को संगठित करने और उसे सामर्थ्यवान बनाने का काम कर रहा है। वह न तो किसी का तुष्टिकरण करता है न ही किसी से भेदभाव। संघ के आसपास बने विभिन्न संगठनों में कांग्रेस तो एक हद तक अपनी मौजूदगी बनाए हुए है लेकिन जिस नेता (महात्मा गांधी) के बूते उसे आजाद भारत की सत्ता मिली, उसके विचारो...