न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!
-डॉ. निवेदिता शर्मा
भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि न्याय हमेशा ही समाज की बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए समानता, गरिमा और मानवीय अधिकारों की रक्षा का सशक्त माध्यम है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया हालिया निर्णय, जिसमें विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति एवं आश्रित कोटे के लाभों से बाहर रखने को असंवैधानिक ठहराया गया है, भारतीय न्यायिक इतिहास में महिला अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय कहलाएगा ।
वास्तव में यह निर्णय उस सोच को भी चुनौती देता है जो विवाह के बाद बेटी को उसके माता-पिता के परिवार से अलग मान लेने की प्रवृत्ति रखती है। कई बार माता-पिता के लिए भी और कई बार परिवार के भाई एवं अन्य कुटुम्बजनों के लिए। माननीय न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने स्पष्ट कहा कि विवाहित पुत्री को “परिवार”...








