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प्रशिक्षण के इंतजार में क्यों खड़े हैं देश के भावी अफसर?

प्रशिक्षण के इंतजार में क्यों खड़े हैं देश के भावी अफसर?

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By: Commissio Union-Public-Service प्रशिक्षण के इंतजार में क्यों खड़े हैं देश के भावी अफसर? अभिषेक शुक्ल प्रतिवर्ष अगस्त और सितंबर का महीना लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में एक नई ऊर्जा लेकर आता है, लेकिन अब अक्टूबर गुजर रहा है और संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के नवीनतम बैच का आधारभूत प्रशिक्षण कार्यक्रम अब तक शुरू नहीं हो सका है। अंतिम परिणाम घोषित होने के बावजूद, सैकड़ों चयनित उम्मीदवार सेवा और संवर्ग आवंटन की राह देख रहे हैं। इस अभूतपूर्व देरी के केंद्र में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की प्रशासनिक उलझनें और आरक्षण नियमों, विशेषकर अन्य पिछड़ा वर्ग के क्रीमी लेयर प्रावधानों से जुड़े गहरे कानूनी विवाद हैं। इस वर्तमान गतिरोध की मुख्य वजह कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र का गलत प्रशासनिक अनुपालन है। मूल का...
न्यू स्टार्ट के बाद परमाणु हथियारों की नई होड़, दुनिया पर बढ़ता परमाणु खतरा

न्यू स्टार्ट के बाद परमाणु हथियारों की नई होड़, दुनिया पर बढ़ता परमाणु खतरा

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By: WO ARTICLE-NEW-START-NEW-NUCLEAR-ARMS-RACE-GROWING न्यू स्टार्ट के बाद परमाणु हथियारों की नई होड़, दुनिया पर बढ़ता परमाणु खतरा - अमरेश द्विवेदी हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के 81 साल बाद दुनिया एक बार फिर परमाणु खतरे के दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिए बनाए गए कई महत्वपूर्ण समझौते या तो समाप्त हो चुके हैं या कमजोर पड़ गए हैं। इसी बीच अमेरिका, रूस और चीन समेत प्रमुख परमाणु शक्तियां अपने परमाणु शस्त्रागार के आधुनिकीकरण और विस्तार में जुटी हैं। इससे परमाणु हथियारों की नई होड़ और गलतफहमी के कारण परमाणु संघर्ष का जोखिम बढ़ने की चिंता सामने आ रही है। जनवरी में ‘बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ ने अपनी ‘डूम्सडे क्लॉक’ को आधी रात से 85 सेकंड पहले पर रखा था। यह 1947 में घड़ी बनाए जाने के बाद से मानवता के संभावित विनाश के सबसे करीब का ...
स्ट्रीट फूड के लिए नए सिरे से नियमन की जरूरत

स्ट्रीट फूड के लिए नए सिरे से नियमन की जरूरत

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By: REGULATION ARTICLE-STREET-FOOD स्ट्रीट फूड के लिए नए सिरे से नियमन की जरूरत -योगेश कुमार सोनी देशभर में स्ट्रीट फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक सड़क किनारे ठेले, रेहड़ी और छोटी दुकानों पर मिलने वाला भोजन आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का ्सा बन चुका है। कम कीमत, आसानी से उपलब्धता और स्थानीय स्वाद इसकी लोकप्रियता का बड़ा कारण है। लेकिन इसके साथ भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्ट्रीट फूड बेचने वाले लाखों छोटे कारोबारी अपनी आजीविका इसी व्यवसाय से चलाते हैं। इसलिए नियमन का उद्देश्य उन्हें परेशान करना या उनकी रोजी-रोटी छीनना नहीं होना चाहिए। जरूरत ऐसे व्यावहारिक नियमों की है, जिनसे कारोबार भी चलता रहे और लोगों को सुरक्षित एवं स्वच्छ भोजन भी मिल सके। सरकारों को स्ट्रीट फूड के लिए एक व्यापक और आधुनिक ...
शरिया में फांसी

शरिया में फांसी

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By: PUNISHMENT ARTICLE-CAPITAL शरिया में फांसी -हृदयनारायण दीक्षित मनुष्य हजारों वर्ष से समाज बनाकर चल रहा है इसीलिए मनुष्य को सामाजिक प्राणी भी कहा जाता है। समाज का निर्माण 100-200 साल पुरानी घटना नहीं है। मनुष्य ने समाज रचा। समाज के सदस्यों ने अपने लिए आचार संहिता बनाई। प्राचीनकाल में स्वयं अपनी गढ़ी आचार संहिता को लेकर उसने समाज का संचालन किया। सामाजिक अनुबंध सिद्धांत के जन्मदाताओं में हॉब्स का नाम बहुत पुराना है। उन्होंने लिखा है कि प्रारंभ में व्यवस्था अराजक थी। उन्होंने इसे प्रकृति की स्थिति माना। अनुमान है-उन्होंने उसी अराजक व्यवस्था से मुक्त होने के लिए एक सामान्य शपथपत्र या एफिडेविट दोहराया होगा। हॉब्स के ग्रंथ ‘लेवियाथन‘ में शपथपत्र में लिखा गया है, ”मैं अपने ऊपर शासन करने का अधिकार इस एक मनुष्य या मनुष्यों की इस सभा को देता हूँ और इसे अधिकृत करता हूँ, इस शर्त पर कि तुम भी अ...
एआई का अमृत सभी को चाहिए लेकिन विष को कौन रोकेगा!

एआई का अमृत सभी को चाहिए लेकिन विष को कौन रोकेगा!

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By: DANGERS ARTICLE-AI-CHALLENGES एआई का अमृत सभी को चाहिए लेकिन विष को कौन रोकेगा! गिरिराज अग्रवाल एआई का गॉडफादर कहे जाने वाले कंप्यूटर वैज्ञानिक जेफ्री हिंटन इन दिनों बेहद चिंतित हैं। गूगल की नौकरी छोड़ने के बाद वे एआई की चुनौतियों पर खुलकर बोल रहे हैं। जेफ्री हिंटन कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं हैं, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया जाए। साल 2024 में उन्हें भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। आज एआई का जो दिमाग हमारे सवालों के जवाब देता है, उन्होंने उसी न्यूरल नेटवर्क पर शोध किया था। इसलिए वे जानते हैं कि एआई का यह आर्टिफिशियल दिमाग क्या-क्या कर सकता है और कहां-कहां खतरा है। एआई सिस्टम बेहद स्मार्ट हो चुके हैं। वे अब इंसानी दिमाग के दर्ज पर काम करने लगे हैं। सिर्फ तार्किक बातें नहीं, चिंतन भी। अब बहस इस बात पर हो रही है कि क्या उनमें चेतना भी आ चुकी है और क्या उनमें दुख, शोक, निराशा...
लोकतंत्र की मर्यादा और विपक्षी दलों का रवैया

लोकतंत्र की मर्यादा और विपक्षी दलों का रवैया

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By: PARTIES ARTICLE-DEMOCRACY-OPPOSITION लोकतंत्र की मर्यादा और विपक्षी दलों का रवैया हृदयनारायण दीक्षित लोकतंत्र असाधारण अनुशासन से ही सफल होता है। भारत के संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र को संविधान व्यवस्था का मूल तत्व माना था। संविधान निर्माताओं ने इसीलिए संविधान मे अनेक संस्थाओं की व्यवस्था की। शासन के तीन मुख्य अंग बताए गए। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव हैं। उन्होंने जनप्रतिनिधियों द्वारा संचालित विधायिका की व्यवस्था की। वयस्क मताधिकार के आधार पर विधायिका चुने जाने की विधि बनी। भारत के संविधान (अनुच्छेद 324) में निर्वाचन सम्पन्न कराने के लिए एक आयोग का प्रावधान किया गया। भारत के निर्वाचन आयोग ने अपनी स्थापना (1950) से लेकर अब तक केन्द्र के (लोकसभा) 18 आम चुनाव और राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं के 400 से अधिक आम चुनाव स...
विदेशी फंडिंग का आरोप : सनसनी से नहीं, सबूतों से तय होनी चाहिए सच्चाई

विदेशी फंडिंग का आरोप : सनसनी से नहीं, सबूतों से तय होनी चाहिए सच्चाई

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सौरभ वाष्र्णेयबिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाना लोकतंत्र, राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक विश्वसनीयता के लिए कितना उचित? यह सवाल अपने आप में ही प्रश्रचिन्ह लगा रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक गतिविधियों, चुनावी प्रक्रियाओं और जन आंदोलनों पर बाहरी प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन किसी आशंका को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना और किसी राजनीतिक दल पर विदेशी धन लेकर देश में अशांति फैलाने का आरोप लगाना दो अलग-अलग बातें हैं। यही अंतर जिम्मेदार पत्रकारिता, निष्पक्ष राजनीतिक विमर्श और लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद है।हाल ही में अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री मैरी मिलबेन के नाम से सोशल मीडिया के जरिये सामने आए एक बयान में भारत में सक्रिय एक राजनीतिक दल को अम...
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आतंकी चेहरा: सुरक्षा को लेकर नई चुनौती

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आतंकी चेहरा: सुरक्षा को लेकर नई चुनौती

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By: TERRORISM AI-NEW-CHALLENGES-SECURITY कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आतंकी चेहरा: सुरक्षा को लेकर नई चुनौती डॉ. अनिल कुमार निगम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब केवल विकास और नवाचार का औजार नहीं रहा, उसका दुरुपयोग आतंकवाद की पहुंच, प्रचार और प्रभाव को बढ़ाने का माध्यम भी बन सकता है। जिस तकनीक से दुनिया ज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और रक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रही है, वही तकनीक आतंकवादी संगठनों के हाथों में पड़कर सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकती है। सवाल यह नहीं कि एआई उपयोगी है या खतरनाक बल्कि यह है कि इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए दुनिया कितनी तैयार है। ब्रिटेन की घरेलू खुफिया एजेंसी MI5 के प्रमुख सर केन मैक्कलम ने हाल ही में 2026 में एआई के दुरुपयोग से जुड़े आतंकवादी खतरों पर चिंता जताई है। यह चेतावनी भारत सहित उन सभी देशों के लिए प्रासंगिक है, जहां आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और डि...
देश विरोध का खतरनाक खेल खेलते राहुल गांधी

देश विरोध का खतरनाक खेल खेलते राहुल गांधी

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congress-rahul-gandhi-modi-govt-bharat-india देश विरोध का खतरनाक खेल खेलते राहुल गांधी - डॉ. मयंक चतुर्वेदी पिछले कुछ समय से देश में राजनीति का ऐसा विकृत स्वरूप उभर रहा है, जो देश की संप्रभुता के लिए गंभीर चेतावनी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब घरेलू राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं देश की सीमाओं को लांघकर विदेशी ताकतों, अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट्स और वैश्विक संस्थाओं की दहलीज पर समर्थन मांगने लगें तो वह लोकतंत्र को खोखला करती हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा विदेशी धरती पर जाकर भारतीय लोकतंत्र की स्थिति पर दिए गए बयान, एलन मस्क जैसे दंभी विदेशी अरबपतियों की भारत-विरोधी झुंझलाहट और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार निकाय जैसी संस्थाओं का पक्षपातपूर्ण रवैया, वस्तुत: यह सब किसी संयोग का ्सा नहीं लगते। एक के बाद एक चुनावों में पराजय झेलने के बाद घरेलू राजनीति में अस्थिरता पैदा करने और चुनी हुई मोदी स...
पत्रकारिता की मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

पत्रकारिता की मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

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By: Fre The-Ethics-of-Journalism पत्रकारिता की मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी पत्रकारिता का उद्देश्य किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल का गुणगान करना नहीं बल्कि जनहित के सवालों को निष्पक्षता, निर्भीकता और जिम्मेदारी के साथ उठाना है। डिजिटल दौर में पत्रकार, स्वतंत्र कंटेंट निर्माता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के बीच अंतर तथा उनकी जवाबदेही पर बहस जरूरी हो गई है।लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसकी बुनियाद निष्पक्षता, स्वतंत्रता, तथ्यपरकता और जनहित पर टिकी होती है। पत्रकार का दायित्व सत्ता से सवाल पूछना, व्यवस्था की खामियों को उजागर करना और समाज के सामने तथ्यों को प्रस्तुत करना है लेकिन जब पत्रकारिता के मूल्यों पर राजनीतिक हित हावी होने लगें, तब उसकी स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और मर्यादा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज जंतर-मंतर से लेकर न्यायालयों ...