
नई दिल्ली, 12 अक्टूबर। बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता फैलाने की दिशा में एक दशक पहले जो सफर शुरू किया था, वह आज एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। उनकी संस्था “लिव लव लाफ” (Live Love Laugh) ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बातचीत की शुरुआत की, जब यह विषय समाज में अब भी एक वर्जना माना जाता था।
हाल ही में सीएनबीसी-टीवी18 की एंकर शिरीन भान से बातचीत में दीपिका ने बताया कि इस यात्रा की शुरुआत कितनी मुश्किल रही। उन्होंने कहा — “मुझे आज भी याद है जब मैंने पहली बैठक अपने घर पर की थी। मेरे साथ डॉ. श्याम और अन्ना चैंडी थे — वही लोग जिनसे मैंने मदद ली थी। उस वक्त बहुत संदेह था कि एक सेलिब्रिटी मानसिक बीमारी पर क्यों बात कर रही है। लोग कहते थे — क्या यह कोई पब्लिसिटी स्टंट है? या फिर किसी दवा कंपनी से पैसे मिल रहे हैं? हमें इन सब सवालों से जूझना पड़ा।”
दीपिका ने कहा कि इन आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने अपनी टीम से कहा — “हमें बस सिर झुकाकर काम करते रहना है।” उन्होंने कहा कि उनका सपना है — “भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता उतनी आम हो जाए जितना भारत में गल्ली क्रिकेट है।”
क्यों लोग थेरेपी लेने से डरते हैं?
कोलकाता के सीएमआरआई अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. सब्यसाची मित्रा ने बताया कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है। लोग महीनों या वर्षों तक अवसाद या चिंता से जूझते रहते हैं, लेकिन मदद नहीं लेते क्योंकि उन्हें समाज के ताने या कमजोर समझे जाने का डर होता है। उन्होंने कहा — “लोगों को लगता है कि मदद मांगना कमजोरी है, जबकि असल में यह आत्म-नियंत्रण की दिशा में एक मजबूत कदम है।”
डॉ. मित्रा के अनुसार, परिवार और दोस्तों की भूमिका भी बेहद अहम है। “कभी-कभी केवल सुनना, धैर्य रखना और बिना जजमेंट के साथ देना ही बहुत बड़ी मदद साबित होती है। स्कूलों और दफ्तरों को भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील होना चाहिए — जैसे लचीले कामकाज के घंटे या परामर्श सुविधा उपलब्ध कराना।”
थेरेपी क्यों ज़रूरी है?
क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक डॉ. रिम्पा सरकार के मुताबिक, किसी दर्दनाक घटना के बाद लोग अक्सर अपराधबोध, उलझन या आत्मग्लानि में फंस जाते हैं। ऐसे में थेरेपी उन्हें एक सुरक्षित माहौल देती है जहां वे अपनी भावनाओं को समझ सकते हैं और खुद को फिर से संभाल सकते हैं।
उन्होंने कहा — “थेरेपी कोई जादू नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और प्रमाणित प्रक्रिया है, जैसे शरीर की नियमित जांच होती है, वैसे ही मानसिक स्वास्थ्य की जांच भी सामान्य बात होनी चाहिए।”
डॉ. रिम्पा ने आगे कहा कि दीपिका जैसी हस्तियां जब खुलकर मानसिक स्वास्थ्य पर बात करती हैं तो इससे समाज में कलंक (stigma) घटता है। उन्होंने कहा — “अगर कोई थेरेपी लेने में शर्म महसूस करता है, तो मैं उसे याद दिलाती हूं — इलाज वहीं से शुरू होता है जब आप खुद को प्राथमिकता देना शुरू करते हैं। जब आप अपनी देखभाल करना सीखते हैं, तो दुनिया की राय मायने नहीं रखती।”
दीपिका पादुकोण का यह संदेश न सिर्फ उनके प्रशंसकों बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा है — मानसिक स्वास्थ्य कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और आत्म-प्रेम का प्रतीक है।
नोट: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। किसी भी मानसिक स्वास्थ्य समस्या के लिए अपने चिकित्सक या काउंसलर से सलाह अवश्य लें।
