नई दिल्ली। देशभर में आबादी की गणना (Population count) के चरण में अब महज छह महीने का समय शेष बचा है। ऐसे में भारत (India) के महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त (Registrar General and Census Commissioner+ RGI) का कार्यालय जातिगत जनगणना (Caste Census) कराने की सटीक कार्यप्रणाली और पद्धति को लेकर गहन मंथन में जुटा हुआ है। आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़ों को भी शामिल किया जाना है, लेकिन इसे किस प्रकार दर्ज किया जाए इसको लेकर सरकार के सामने कई प्रशासनिक और नीतिगत चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इस समय गृह मंत्रालय और आरजीआई के सामने दो प्रमुख विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला ओपन-एंडेड फॉर्मेट, जिसके तहत नागरिकों को खुद अपनी जाति बताने और दर्ज कराने की छूट होगी। दूसरा ड्रॉप-डाउन मेन्यू, जिसके तहत केवल पहले से मान्यता प्राप्त और अधिसूचित जातियों की एक तय सूची में से ही चयन करने का विकल्प दिया जाएगा। हालांकि ये दोनों ही विकल्प अपने-आप में बड़ी व्यावहारिक और वैचारिक जटिलताओं से घिरे हुए हैं।
2011 के कड़वे अनुभव से सीख
पहला विकल्प यानी ओपन-एंडेड फॉर्मेट अपनाने पर 2011 की सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) जैसी अराजक स्थिति दोबारा पैदा होने का गंभीर जोखिम है। वर्ष 2011 की गणना के दौरान जब लोगों को स्वयं अपनी जाति दर्ज करने की छूट दी गई थी तो आंकड़ों की गुणवत्ता इतनी खराब हो गई कि एक प्रामाणिक जातिगत डेटाबेस तैयार ही नहीं हो सका।
2011 की SECC का सच
वर्ष 1931 में हुई आखिरी व्यापक जाति जनगणना में देश भर में कुल 4,147 जातियों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया था। वहीं, 2011 की SECC में सत्यापन की ठोस व्यवस्था न होने के कारण 46.7 लाख से अधिक अलग-अलग जातिगत नाम दर्ज हो गए थे। स्पेलिंग की गलतियों, स्थानीय उपनामों और क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण डेटा इतना उलझ गया कि केंद्र सरकार को अंततः जाति से जुड़े इन कच्चे आंकड़ों को जारी करने पर रोक लगानी पड़ी थी।
सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, “जाति जनगणना एक बेहद जटिल और संवेदनशील काम है। विभिन्न पक्षों से कई सुझाव और आपत्तियां मिल रही हैं, जिन पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। 2011 के अनुभवों को दोहराए बिना एक सटीक तरीका खोजने के लिए कई तकनीकों का परीक्षण जारी है। जाति जैसे संवेदनशील विषय पर कोई भी प्रशासनिक चूक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे सकती है।”
दूसरे विकल्प पर आरएसएस को आपत्ति
दूसरे विकल्प के तौर पर केंद्र और राज्यों की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अन्य जातियों की आधिकारिक सूचियों को मिलाकर एक एकीकृत ड्रॉप-डाउन मेन्यू तैयार करने का सुझाव है। गौरतलब है कि वर्तमान में जनगणना ऐप के जरिए केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए ही ड्रॉप-डाउन विकल्प मौजूद है, जबकि अन्य सभी को अन्य श्रेणी में रखा जाता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित नए मॉडल के तहत अन्य श्रेणी के भीतर ही केंद्र और राज्य सरकारों की मान्यता प्राप्त जातियों का एक डिजिटल ड्रॉप-डाउन मेन्यू देने की योजना है, जिसे बैकएंड में आरजीआई के डेटाबेस से जोड़ा जाएगा। लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।
रिपोर्ट में आरएसएस के एक पदाधिकारी के हवाले से कहा, “आज हमारे पास जो जातिगत ढांचा मौजूद है वह बड़े पैमाने पर अंग्रेजों द्वारा अपनी प्रशासनिक सहूलियत के लिए तैयार किया गया था। यदि आज की जनगणना भी उन्हीं सूचियों पर निर्भर रहेगी तो यह उस सामाजिक व्यवस्था को और मजबूत करेगी जिसे ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज को बांटने के लिए इस्तेमाल किया था।” आरएसएस का रुख रहा है कि भारत में जातिगत पहचान हमेशा से गतिशील और स्थानीय रही है।
तमाम नीतिगत मतभेदों और तकनीकी चुनौतियों के बावजूद सरकार इस बात पर स्पष्ट है कि जाति जनगणना कराई जाएगी। सरकार का मानना है कि इसके लिए आप चाहे जो भी रास्ता चुनें व्यावहारिक कठिनाइयां और चुनौतियां सामने आएंगी ही।
