
कोलकाता, 02 फरवरी (प्रेस ब्यूरो)। केंद्रीय बजट में कोलकाता मेट्रो को अपेक्षित महत्व न मिलने की एक प्रमुख वजह राज्य सरकार का असहयोग बताया जा रहा है। मेट्रो रेल अधिकारियों के अनुसार, विभिन्न मेट्रो परियोजनाएँ राज्य के कई हिस्सों में लंबे समय से रुकी हुई हैं, जिसके कारण केंद्र सरकार ने मेट्रो विस्तार के लिए ‘धीरे चलो’ नीति अपनाई है।
बजट के आंकड़े साफ बताते हैं कि कोलकाता मेट्रो के लिए आवंटन में मामूली बढ़ोतरी हुई है या कुछ कॉरिडोरों के लिए राशि में कमी की गई है। जोका–एस्प्लानेड (पर्पल लाइन) के लिए 906.6 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले साल से केवल 5.6 करोड़ रुपये अधिक है। वहीं, न्यू गरिया–एयरपोर्ट (ऑरेंज लाइन) के लिए आवंटन घटकर 705.5 करोड़ रुपये हो गया है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में यह राशि 720 करोड़ रुपये थी। ईस्ट–वेस्ट मेट्रो कॉरिडोर को इस वर्ष 529 करोड़ रुपये मिले हैं, जो पिछले बजट से 29 करोड़ रुपये अधिक है।
मेट्रो सूत्रों के अनुसार, चिंगड़िघाटा क्षेत्र में ऑरेंज लाइन के महज 366 मीटर हिस्से का काम विभिन्न प्रशासनिक और यातायात संबंधी जटिलताओं के कारण रुका हुआ है। जब तक ट्रैफिक ब्लॉक की अनुमति नहीं मिलती, तब तक सॉल्टलेक सेक्टर फाइव तक मेट्रो परियोजना को आगे बढ़ाना संभव नहीं है। इस संबंध में राज्य सरकार से बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2024–25 के केंद्रीय बजट में ऑरेंज लाइन के लिए 1719.3 करोड़ रुपये का बड़ा आवंटन किया गया था, लेकिन 2026–27 के बजट में यह राशि घटकर 705.5 करोड़ रुपये रह गई।
मेट्रो अधिकारियों के अनुसार, राज्य में लंबित परियोजनाएँ और समन्वय की कमी ही इस भारी कटौती का मुख्य कारण हैं। मेट्रो रेल से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि जब तक राज्य सरकार की ओर से परियोजनाओं में आ रही बाधाओं को दूर करने में सक्रिय सहयोग नहीं मिलता, तब तक केंद्र सरकार की ओर से मेट्रो परियोजनाओं के लिए बड़े बजटीय प्रावधान की उम्मीद करना मुश्किल है। यही वजह है कि फिलहाल कोलकाता मेट्रो के भविष्य को लेकर केंद्र ने ‘धीरे चलो’ की रणनीति अपनाई है।
