
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, 12 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। मकर संक्रांति केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य, कृषि, समाज और मानव मूल्यों के संतुलन का अद्भुत उत्सव है। यह पर्व जिले के जनजीवन में गहराई से बसा हुआ है, जहां श्रद्धा के साथ सामाजिक चेतना, सहयोग और सामूहिकता का दृश्य देखने को मिलता है। मकर संक्रांति हर वर्ष जीवन को नई दिशा देने, आत्मचिंतन तथा सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करने का अवसर प्रदान करती है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 14 जनवरी को श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष मकर संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 3:13 बजे से शुरू होकर 4:58 बजे तक रहेगा। इस समय स्नान, दान, सूर्य पूजन और सेवा कार्य करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है, जिससे लोग इस समय को विशेष महत्व देते हैं।
मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन का प्रतीक है, जो प्रकाश और उन्नति का संदेश देता है। इस खगोलीय परिवर्तन के साथ नई संभावनाओं की शुरुआत होती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता और मेहनत को अपनाने की प्रेरणा मिलती है।
मकर संक्रांति पर स्नान का विशेष महत्व है। जिले के विभिन्न जल स्रोतों पर सुबह से ही श्रद्धालु भीड़ में जुट जाते हैं और कड़ाके की ठंड में भी सूर्य को अर्ध्य अर्पित करते हैं, जो आत्मशुद्धि और अनुशासन का प्रतीक है।
इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और कंबल का दान मुख्य रूप से किया जाता है। यह पर्व जरूरतमंदों की सहायता को सामाजिक जिम्मेदारी मानता है, और जिले में सामूहिक दान एवं सेवा कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
कृषि प्रधान इस जिले में मकर संक्रांति किसानों के लिए मेहनत के सफल परिणाम का उत्सव है। नई फसल के आगमन के साथ यह पर्व संतोष और आभार का प्रतीक है। किसान सूर्य और धरती के प्रति आभार प्रकट करते हैं।
मनेंद्रगढ़ क्षेत्र में सिद्ध बाबा मंदिर और चिरमिरी में लोक गीत-नृत्य तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। भरतपुर क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा, अभिषेक और भजन-कीर्तन होते हैं।
हसदेव नदी, जो जिले की जीवनरेखा है, पर इस दिन श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। लोग पवित्र स्नान व पूजा के माध्यम से परिवार और समाज की खुशहाली की कामना करते हैं।
मकर संक्रांति गाँव-गाँव में लगने वाले मेलों, लोक गीत, नृत्यों के साथ मनाया जाता है। इसमें तिल-गुड़ के लड्डू, खिचड़ी और मौसमी फल सामाजिक एकता का प्रतीक होते हैं। यह पर्व नई पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी अवसर प्रदान करता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह
