भारत में वामपंथी वैचारिकी, विश्वविद्यालयी आंदोलन और नक्सली समर्थन
शहर, 09 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। लेखक: LN Star Newsभारत का लोकतंत्र अपनी विविधता, मतभिन्नता और खुली बहस की परंपरा के कारण विश्व में विशिष्ट रहा है। किंतु पिछले दो दशकों में एक ऐसी वैचारिक धारा विकसित हुई है, जिसने विश्वविद्यालयों, वामपंथी छात्र संगठनों, शहरी बुद्धिजीवी समूहों और माओवादी हिंसा को व्यापक वैचारिक सूत्र में पिरो दिया है। यह विमर्श केवल छात्र-राजनीति या असहमति तक सीमित नहीं; यह राज्य-विरोध, पहचान की राजनीति, ‘क्रांतिकारी प्रतिरोध’ की संस्कृति और अंततः माओवादी सशस्त्र संघर्ष तक फैला सुनियोजित नैरेटिव बन चुका है। सबसे स्पष्ट उदाहरण दिल्ली के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय- जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया तथा हैदराबाद एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय हैं, जहाँ विमर्श का झुकाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय दृष्टिकोण से हटकर एक प्रकार के वैचारिक अराजकवाद की ओर दिखाई देता है। जेएनयू में एसएफआई, एआईएसए, डी...
