डॉ. निवेदिता शर्मा
संयुक्त राष्ट्र ने बाल मृत्यु दर में गिरावट को लेकर भारत की जमकर सराहना की है। दरअसल, हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की उपलब्धियों को वैश्विक मंच पर उजागर किया है। यूएनआईजीएमई की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने बाल मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाकर दुनिया को एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए नरेंद्र मोदी ने भी इसे देश की सामूहिक सफलता बताया और स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए सतत प्रयासों की सराहना की है।
आंकड़ों में झलकती ऐतिहासिक सफलता
रिपोर्ट के अनुसार, 1990 में जहां नवजात शिशु मृत्यु दर 57 प्रति हजार जीवित जन्म थी, वह 2024 में घटकर 17 रह गई है, जो लगभग 70 प्रतिशत की कमी को दर्शाती है। इसी प्रकार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 127 से घटकर 27 प्रति हजार हो गई है, जोकि लगभग 79 प्रतिशत की गिरावट है। ये आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक बनाते हुए उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया है।
नीतिगत हस्तक्षेप और केंद्र सरकार की भूमिका
भारत सरकार ने बाल और मातृ स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू कीं, जिनका सीधा प्रभाव मृत्यु दर में कमी के रूप में सामने आया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने देश के दूर-दराज क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित की, वहीं जननी सुरक्षा योजना ने संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं को कम किया। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने गर्भवती महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच और विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराया। इन योजनाओं ने मिलकर एक ऐसा स्वास्थ्य तंत्र तैयार किया, जिसमें जोखिम की पहचान समय रहते हो सके और उपचार तुरंत उपलब्ध हो।
टीकाकरण अभियान और जन-जागरूकता का प्रभाव
भारत की सफलता में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। मिशन इंद्रधनुष जैसे अभियानों ने यह सुनिश्चित किया कि हर बच्चे तक जीवन रक्षक टीके पहुंचें। टीकाकरण के माध्यम से खसरा, डायरिया, निमोनिया जैसी बीमारियों पर नियंत्रण पाया गया, जो पहले बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारण थे। इसके साथ ही आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी सेवाओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति विश्वास बढ़ा और उनका उपयोग भी अधिक हुआ। यह जनभागीदारी भारत की सफलता का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है।
संस्थागत प्रसव और नवजात देखभाल में सुधार
भारत में संस्थागत प्रसव की दर में हुई वृद्धि ने नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता ने प्रसव से जुड़े जोखिमों को काफी हद तक कम किया है। इसके साथ ही नवजात गहन चिकित्सा इकाइयों (NICU) का विस्तार भी एक बड़ा कदम साबित हुआ है। इन इकाइयों में समय से पहले जन्मे या बीमार शिशुओं को विशेष देखभाल मिलती है, जिससे उनकी जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है। दक्षिण एशिया में नवजात मृत्यु दर में आई कमी में भारत की इन पहलों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
बीमारियों से मुकाबला और लक्षित रणनीति
भारत ने उन बीमारियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया, जो बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारण थीं। डायरिया के इलाज के लिए ORS और जिंक के उपयोग को बढ़ावा दिया गया, वहीं निमोनिया के उपचार और रोकथाम के लिए व्यापक अभियान चलाए गए। मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रमों ने प्रभावित क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। इन लक्षित प्रयासों ने यह सिद्ध किया कि यदि सही दिशा में योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए, तो रोकी जा सकने वाली बीमारियों से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
केंद्र-राज्य समन्वय और प्रभावी क्रियान्वयन
भारत की इस सफलता के पीछे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच मजबूत समन्वय भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है। केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों को राज्यों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू किया, जिससे योजनाओं का प्रभाव अधिक व्यापक और प्रभावी हुआ। यह सहकारी संघवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें नीति निर्माण और क्रियान्वयन के बीच संतुलन बना रहा। इस समन्वय ने स्वास्थ्य सेवाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तकनीक और डेटा आधारित स्वास्थ्य प्रबंधन
डिजिटल तकनीक के उपयोग ने भी भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को नई दिशा दी है। मातृ और शिशु स्वास्थ्य की निगरानी के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा आधारित प्रणालियों का उपयोग किया गया, जिससे योजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन संभव हुआ। इससे सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ ही संसाधनों का बेहतर उपयोग भी सुनिश्चित हुआ। डेटा आधारित निर्णय लेने की यह प्रक्रिया भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाती है।
दक्षिण एशिया और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया में बाल मृत्यु दर में आई गिरावट में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। 2000 में जहां इस क्षेत्र में प्रति हजार जन्मों पर 92 बच्चों की मृत्यु होती थी, वहीं 2024 में यह घटकर लगभग 32 रह गई है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारत के प्रयासों का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर आगे वैश्विक प्रभाव के रूप में दिख रहा है। हालांकि भारत ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां सामने हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता, कुपोषण की समस्या और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं की सार्वभौमिक उपलब्धता जैसे मुद्दे अभी भी समाधान की मांग करते हैं। दक्षिण एशिया में अभी भी दुनिया के लगभग 25 प्रतिशत बाल मृत्यु के मामले सामने आते हैं, जो इस दिशा में निरंतर प्रयासों की आवश्यकता को दर्शाता है। भारत को अब अपनी उपलब्धियों को बनाए रखते हुए नई चुनौतियों का समाधान करना होगा।
एक प्रेरक मॉडल के रूप में भारत
आज भारत में बाल मृत्यु दर में आई गिरावट एक ऐसी उपलब्धि है, जोकि निश्तिच ही देश के लिए गर्व का विषय है। यह दुनिया के अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक प्रेरणा है। संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि ठोस नीतियां, मजबूत इच्छाशक्ति और प्रभावी क्रियान्वयन होने लगे तब उस स्थिति में कोई समस्या लम्बे समय तक नहीं ठहर सकती है। ऐस में बड़े से बड़े लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा व्यक्त किया गया विश्वास इस दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आने वाले समय में भारत यदि इसी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता रहा, तब इतना सुनिश्चित है कि वह वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका भी निभाता हुआ दिखाई देगा।
(लेखिका मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की पूर्व सदस्य एवं सामाजिक कार्यकर्ता है)
