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लहजे से नहीं, लगन से बनती है पहचान : मृणाल ठाकुर

मृणाल ठाकुर - फोटो सोर्स एक्स
मृणाल ठाकुर - फोटो सोर्स एक्स

रोशनी से भरे इस दौर में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो सिर्फ पर्दे पर नहीं, दिलों में बस जाते हैं। मृणाल ठाकुर उन्हीं में से एक हैं, जिनकी आंखों में सपनों की चमक है और मुस्कान में संघर्ष की कहानी। छोटे पर्दे की सादगी भरी शुरुआत से लेकर बड़े परदे की दमदार मौजूदगी तक, उनका हर कदम जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल रहा है।

टीवी शो ‘मुझसे कुछ कहती… ये खामोशियां’ और ‘कुमकुम भाग्य’ से पहचान बनाने वाली मृणाल ने जब फिल्मों की दुनिया में कदम रखा, तो संवेदनशील फिल्म ‘लव सोनिया’ से अपने अभिनय की गहराई का एहसास कराया। इसके बाद ‘सुपर 30’, ‘बटला हाउस’, ‘तूफान’ और ‘जर्सी’ में उनकी मौजूदगी ने साबित किया कि वह सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि हर किरदार को जीने वाली कलाकार हैं। साउथ सिनेमा में ‘सीता रामम’ और हाय नन्ना ने उन्हें पैन-इंडिया पहचान दिलाई। अब प्यार के इस खास मौसम में वह अपनी नई फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ के जरिए एक बार फिर भावनाओं की नई दास्तां लेकर आ रही हैं। 20 फरवरी 2026 को रिलीज हो रही इस फिल्म के मौके पर उन्होंने ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से अपने सफर, संघर्ष और सपनों पर दिल खोलकर बात की।

सवाल : फिल्म के टाइटल में ‘सहर’ शब्द का क्या अर्थ है?

मृणाल ठाकुर : उन्होंने कहा, ‘सहर’ का मतलब होता है भोर, अंधेरे को चीरती हुई रोशनी की पहली किरण। इस शब्द में एक सादगी है, एक देसीपन है, जो हमारी कहानी की आत्मा से जुड़ता है। इसमें उम्मीद है, नई शुरुआत है और एक कोमल भावनात्मक स्पर्श भी। पुराने गीत ‘दो दीवाने शहर में’ से जो शहर, सपनों और प्रेम का एहसास जुड़ा है, वही संवेदना हमारे टाइटल में भी छिपी है। बस हमने उसे थोड़ा अपना रंग दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इस टाइटल का सुझाव संजय लीला भंसाली सर ने दिया था। इसके पीछे एक खूबसूरत सोच भी है। फिल्म में शशांक ‘श’ का सही उच्चारण नहीं कर पाता और ‘शहर’ की जगह ‘सहर’ बोलता है। यह केवल एक उच्चारण की गलती नहीं, बल्कि कहानी का एक मासूम और प्यारा पहलू है। इस तरह ‘सहर’ सिर्फ एक शहर का नाम नहीं, बल्कि नई सुबह, उम्मीद और प्रेम की शुरुआत का प्रतीक बन जाता है।

सवाल : करियर की शुरुआत में क्या आपको रास्ता अनिश्चित या जोखिम भरा लगा? उस दौर में आपने खुद को कैसे संभाला?

मृणाल ठाकुर : हाँ, बिल्कुल। बचपन से ही मेरे भीतर एक झिझक थी। कई बार क्लास में जवाब पता होने के बावजूद मैं हाथ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। मुझे अपनी अंग्रेज़ी को लेकर हीन भावना होती थी, क्योंकि उसमें मराठी लहजा साफ झलकता था। इतना ही नहीं, मेरा नाम ‘मृणाल’ लड़कों जैसा लगता है, इस वजह से स्कूल में बच्चे मुझे चिढ़ाते भी थे। फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद भी यह असुरक्षा मेरे साथ रही। मुझे लगता था कि मुझे और धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलनी चाहिए, मेरे उच्चारण में मराठी लहजा कम होना चाहिए। लेकिन समय के साथ समझ आया कि हमारी असुरक्षाएँ तभी बड़ी बनती हैं, जब हम उन्हें खुद बड़ा बना देते हैं। आज मैं अपने व्यक्तित्व और अपनी जड़ों के साथ पूरी तरह सहज और संतुष्ट हूँ। जहां तक फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ की बात है, इसमें मेरा किरदार ‘रोशनी’ मेरे व्यक्तित्व का करीब साठ प्रतिशत हिस्सा दर्शाता है। बाकी चालीस प्रतिशत उसकी अपनी यात्रा और रचनात्मक निर्माण से आता है। यह कहानी दो लोगों के एक-दूसरे की कमियों को समझने, स्वीकारने और उन्हें खूबसूरती में बदल देने की है। हमने एक नरम, सादगी भरी प्रेम कहानी पेश करने की कोशिश की है, ऐसी कहानी जो आज के सोशल मीडिया के शोर में खोती जा रही सच्ची भावनाओं को फिर से जगाने का एक ईमानदार प्रयास है।

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