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फिल्म अस्सी की समीक्षा: जब हर 20 मिनट पर झकझोरती है स्क्रीन और आईना बन जाता है सिनेमा

हम अक्सर खबरों को स्क्रोल करके आगे बढ़ जाते हैं। एक और अपराध, एक और हेडलाइन, एक और बहस। लेकिन क्या होता है उस एक ‘हेडलाइन’ के बाद? अस्सी उसी अनकहे हिस्से को सामने लाती है, जहां आंकड़े इंसान बनते हैं और इंसान जख्म। भारत में यौन अपराधों के आंकड़े सिर्फ सरकारी फाइलों में दर्ज संख्या नहीं हैं, वे उन घरों की चुप्पी हैं जहां हंसी अचानक गायब हो जाती है। निर्देशक अनुभव सिन्हा एक बार फिर वही करते हैं, जिसके लिए वे जाने जाते हैं, सुविधाजनक सिनेमा नहीं, असुविधाजनक सच। ‘मुल्क’ और ‘थप्पड़’ के बाद इस बार उनके साथ हैं तापसी पन्नू, और नतीजा है एक ऐसी फिल्म जो आपको देखती भी है और परखती भी। टी-सीरीज द्वारा निर्मित ‘अस्सी’ 20 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। लेकिन सवाल रिलीज डेट का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम उस सच्चाई का सामना करने के लिए तैयार हैं, जिसे यह फिल्म हमारे सामने रखती है?

कहानी परिमा (कानी कुस्रुति) की है, एक साधारण टीचर, जो अपने पति विनय (मोहम्मद जीशान अय्यूब) और बेटे ध्रुव (अद्विक में जायसवाल) के साथ दिल्ली में एक सादा और खुशहाल जीवन जी रही है। एक रात, घर लौटते वक्त उसकी दुनिया बिखर जाती है। पांच लोग उसे अगवा कर सामूहिक दुष्कर्म करते हैं और अधमरी हालत में छोड़ देते हैं। इसके बाद फिल्म सिर्फ अपराध की कहानी नहीं रहती, यह न्याय की तलाश, आत्मसम्मान की लड़ाई और समाज की मानसिकता का आईना बन जाती है। वकील रावी (तापसी पन्नू) अदालत में परिमा का पक्ष संभालती हैं। लेकिन कोर्टरूम के भीतर की बहस से ज्यादा मुश्किल है कोर्टरूम के बाहर की निगाहें। ‘अस्सी’ नाम का अर्थ क्या है, यह फिल्म के अंत में एक प्रतीक की तरह खुलता है।

कैसी है फिल्म?

‘अस्सी’ मनोरंजन के लिए नहीं बनी। यह आपको असहज करती है, झकझोरती है और कई बार चुप कर देती है। फिल्म का ट्रीटमेंट बेहद रॉ है। अनुभव सिन्हा किसी भी सीन को ग्लैमरस या सिनेमाई प्रभाव के लिए मुलायम नहीं बनाते। हर 20 मिनट में स्क्रीन पर उभरती स्लेट एक सख्त याद दिलाती है कि अपराध सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, वह आज की सच्चाई है। बीच-बीच में फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी होती है और ‘छतरी मैन’ जैसा सब-प्लॉट हल्का भटकाव देता है, लेकिन मूल कथा की ताकत बनी रहती है।

फिल्म के लेखक गौरव सोलंकी ने संवादों में आक्रोश को शोर नहीं बनने दिया। शब्द शांत हैं, लेकिन असर गहरा है। कोर्टरूम को यहां नाटकीय तमाशा नहीं बनाया गया। बहसें वास्तविक हैं, जज की सख्ती असली लगती है और प्रक्रिया का बोझ महसूस होता है। यही फिल्म की विश्वसनीयता है। अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी की जोड़ी ने बिना किसी लाग-लपेट के सच्चाई को सामने रखा है, और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

अभिनय

कानी कुस्रुति इस फिल्म की धड़कन हैं। उनके चेहरे की खामोशी और आंखों का खालीपन शब्दों से कहीं ज्यादा बोलता है। वे परिमा को निभाती नहीं जीती हैं। तापसी पन्नू एक सधे हुए, दृढ़ और आत्मविश्वासी वकील के रूप में नजर आती हैं। उनका प्रदर्शन संयमित है, लेकिन प्रभावशाली। अद्विक जायसवाल ने मासूमियत के साथ उस बच्चे की उलझन को दिखाया है, जो अचानक बड़ी दुनिया के क्रूर सच से टकरा जाता है। सपोर्टिंग कास्ट में नसीरुद्दीन शाह, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, रेवती और सीमा पाहवा जैसे कलाकार फिल्म को गंभीरता और वजन देते हैं।

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